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Monday, 26 January 2015

कच्छ मोटरसाइकिल यात्रा-भाग-1 इंदौर से अहमदाबाद


सबसे पहले आप सभी को सप्रेम नमस्कार...

में डॉ.सुमित शर्मा इंदौर,मध्य प्रदेश से हु।

यह मेरा पहला ब्लॉग हे,में अपनी तरफ से सर्वश्रेष्ठ लिखनें की कोशिश करूँगा,फिर भीअगर नाकाफी लगे तो अभी से माफ़ी चाहूँगा।

तो अब सीधे यात्रा वृतांत की शुरूवात करते है,
15 जनवरी से 19 जनवरी तक का समय था मेरे पास और योजना थी लंबी बाइक ट्रीप की,योजना में कई जगहें थी,जैसे कि माउंट आबु पर्वत राजस्थान, चिखलधारा महाराष्ट्र,इस सूची मे हिमालय-लेह लद्दाख भी शामिल हो सकता था,जहाँ जाना मेरा सपना है,लेकिन इसके लिए समय और मौसम नाकाफी थे।

इसीलिए अंतिम निर्णय कच्छ का ही हुआ।
कच्छ भारत के पश्चिम में सबसे अंतिम छोर पर है,यहाँ उत्तर की और हमारा पड़ोसी देश पाकिस्तान है,पश्चिम में कच्छ की खाड़ी और अरब सागर स्थित है,दक्षिण में भुज और पूर्व में भचाऊ व अन्य शहर है।
यहाँ कच्छ का सफ़ेद रण प्रमुख पर्यटक केंद्र है,जहाँ सालो पहले समुद्र था,पर अब वह सुख चूका है,फिर भी बारिश के मौसम में यहाँ पानी जमा हो जाता है,और फिर बारिश के मौसम के ख़त्म होते ही सुखना शुरू हो जाता है,और दिसम्बर-जनवरी तक पुरी तरह सुख कर सफ़ेद रेगिस्तान या नमक का रेगिस्तान बन जाता है,लोग कहते है यह रेगिस्तान बहुत खुबसूरत दिखता है,कितना खुबसूरत है सफ़ेद रण, यह तो पहुँचकर ही पता लगेगा।
सफ़ेद रण के अलावा भी वहाँ कई सारी जगह है,आखिर कच्छ भारत का सबसे बड़ा जिला है।

कुछ वर्ष पहले तक यहाँ पर्यटकों का इतना आना जाना नहीं था,लेकिन जबसे कच्छ की ब्रांडिंग जो की पहले गुजरात के पुर्व मुख्यमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और अब अमिताभ बच्चन जी के द्वारा गई,कुछ उसका असर है और कुछ इस जगह का जादु,की आज यह रेगिस्तान भारत के टॉप 10 पर्यटक केन्द्रो में काफी उचे पायदान पर शामिल है ।

ट्रीप में मेरे साथी थे मेरी हमराही मतलब मेरी बुलेट और मेरा परम मित्र डॉ.गिरधर,बस हम 3 ही थे और कोइ नहीं,क्योकि ट्रीप में मुझे ज्यादा भीड़ पसंद नहीं है,भीड़ होने पर हम अपने मन की नहीं कर पाते,और मुझे अपनी योजना पर यात्रा करना पसंद है।

यह यात्रा 5 दिनों की थी।
पहला दिन-
हमारी मंजिल कच्छ का सफ़ेद रण था,इंदौर से करीब 850 कि.मी दुर,पहले दिन के लिये तय किया था कि 600कि.मी के करीब दुरी तय करेंगे,बाकि बची दुरी अगले दिन तय करेंगे।
सारी तैयारी मसलन बाइक सर्विस, पैकिंग सभी 14 जनवरी की रात में ही कर लिया था,योजना अनुसार हमे 15 जनवरी की सुबह 5 बजे इंदौर से रवानगी लेंनी थी,तो मैँ 14 जनवरी की रात क्लिनिक का काम खत्म करने के बाद घर से मम्मी व पापा जी से अलविदा कहते हुवे गिरधर के घर पहुँच गया।

रात में ही बची कुची पेकिंग कर के जल्दी ही सोने की तैयारी कर ली थी,फिर भी रात के 11 तो बज ही गये थे,सोये तो सही पर नींद किसे आना थी,जैसे तैसे रात ख़त्म हुई,मेने सुबह 4 बजे तैयारी शुरू कर दी थी,गिरधर भी जाग के तैयारी मे लग गया था।

फिर भी सुबह 5.20 पर हम घर से निकल पाये,रास्ते के मंदिर में देव दर्शन कर और श्रीमती जी के कहे अनुसार ॐ विष्णवे नमः का मनन करते हुवे यात्रा शुरू की ।
शहर में तो ज्यादा ठंड नहीं थी,लेकिन शहर के बाहर अच्छी खासी ठंड थी।

हमारा पहला लक्ष्य अहमदाबाद पहुँचना था,मार्गो की अगर बात करे तो इंदौर से अहमदाबाद पहुचने के लिए तीन मुख्य मार्ग है..
1.NH-59 इंदौर से धार व झाबुआ होते हुवे दाहोद के रास्ते अहमदाबाद।
इस मार्ग से इंदौर से अहमदाबाद की दुरी सबसे कम 398 कि.मी. है।
इस मार्ग पर अभी निर्माण कार्य हो रहा है और धार से झाबुआ के बीच आदिवासियों के द्वारा लूट आम बात है,ऐसा कई लोग कहते है,अब में तो कभी गया नहीं उस रास्ते,फिर भी हमने इस रास्ते जाना उचित नहीं समझा।
2.NH-3 से मनावर कुक्षी व छोटा उदयपुर के रास्ते बड़ौदा होते हुवे अहमदाबाद
इस मार्ग की स्थिति तो ठीक थी,पर यह हमारा जाना पहचाना नहीं था।
इस मार्ग से इंदौर से अहमदाबाद की दुरी 481 कि.मी.है।
3.इंदौर से बदनावर होते हुए थांदला के रास्ते लिमखेड़ा होते हुए अहमदाबाद ।
इस मार्ग से इंदौर से अहमदाबाद तक की दुरी 451 कि.मी.है।
इस मार्ग की स्थिती सबसे अच्छी व सबसे सुरक्षित है।
इसकी पुष्टि मेने इंदौर बस स्टेशन से गुजरात परिवहन निगम की इंदौर-अहमदाबाद बस के ड्राइवर व कंडक्टर से कर ली थी।

तो सुबह के 5.40बजे,हम अहमदाबाद पहुँचने के लिए नीमच हाईवे पर आ गये।
इस समय हाईवे पर,सुबह सुबह के सुनसान माहौल में बुलेट की डुग डुग बड़ी सुखद सुनाई दे रही थी।
मौसम की अगर बात करे तो इंदौर के बाद बेटमा से मौसम काफी ठंडा और साथ ही साथ कोहरा भी था, शुरुवात में स्पीड 60 की रही होगी,लेकिन सुर्य देव के निकलने के साथ साथ हम 70 की स्पीड से आगे बढ़ते रहे।
तो इस तरह हम सुबह 7.15 बजे बदनावर पहुँचे,अब तक हम 100 कि.मी.की दुरी तय कर चुके थे,यहाँ पर हमने 10 मिनीट का आराम किया,गिरधर भाई ने अब तक बेग को कंधे पर टाँग रखा था,पर अब उसे साइड में साडीगार्ड के पास रस्सी से बांध दिया,अब वह भी आराम से बैठ सकता था,यहाँ गिरधर द्वारा ली गई रस्सी बड़ी काम आई।
यहाँ से निकलते समय 1-1टुकड़ा गुड़तिल की चिक्की खा ली, इससे थोड़ी गर्मी और ऊर्जा दोनों मिली,महेश भैया शुक्रिया,आप के द्वारा लाई गई चिक्की ने अगले 2 दिन साथ दिया।

बदनावर से हमे दाहिनी और मुड़ना था,पेटलावद की ओर,बदनावर से पेटलावद की दुरी करीब 55कि.मी. थी,पेटलावद से ही आदिवासियो का क्षेत्र शुरू हो जाता है,पेटलावद के बाद हम थांदला पहुचे।
थांदला से गुजरात में 2 मार्गो से प्रवेश कर सकते है,
1.थांदला से मेघनगर होते हुवे दाहोद,इस मार्ग की मध्य प्रदेश सीमा पर अच्छी स्थिती नही है।
2.थांदला से लिम्बडी होते हुवे लिमखेड़ा,इस मार्ग से दाहोद बाईपास हो जाता है,इस मार्ग पर कही कोई खराबी नहीं थी तो हमने इसे ही चुना था
दोनों मार्गो में दुरी का भी कोई खास फर्क नही है।
तो हम थांदला से लिम्बडी पहुच चुके थे,लिम्बडी के कुछ पहले से ही गुजरात की सीमा शुरू हुई,लेकिन यहाँ कोई खास बड़ा बोर्ड नहीं था,फिर भी रूककर कुछ फोटो लिये और आगे बढ़ गये।
इस तरह हम सुबह के 9.30बजे के करीब गुजरात राज्य मे पहुच चुके थे
यही से गाडी को गिरधर के हवाले कर में पिछली सीट पर बैठ गया।

कुछ ही देर मे हम लिमखेड़ा पहुच गये,लिमखेड़ा से दाहोद -अहमदाबाद मार्ग पर पहुचना होता है,यह NH59 ही था जिसकी हालत म.प्र में जितनी खस्ता है,गुजरात मे उतनी ही शानदार थी।
यहाँ से अहमदाबाद की दुरी170 कि.मी.थी,यही पर 5 मिनीट का आराम व थोड़ी चहल कदमी कर,एक एक चिक्की खाकर सफ़र फिर शुरू कर दिया।
बदनावर से लिमखेड़ा तक 2 लेन रोड था,लिमखेड़ा से अहमदाबाद तक शानदार 4 लेन शरू हो गया था,तो गाडी की स्पीड भी 80 के आसपास कर हम आगे बढ़ते रहे।
लिमखेड़ा से पिपलोद,गोधरा होते हुऐ हम कठलाल पहुचे।
फिर से 5 मिनीट का आराम और 1-1 चिक्की स्वाद ले कर अब फिर से मेंने गाडी को चलाना शुरू किया और गिरधर पिछली सीट पर से नज़ारे देखने लगा।

अब हम अहमदाबाद के करीब थे,देखते ही देखते कई सारे दौ पहिया वाहनों,के अगले सीरो पर मुड़े हुए तार लगे हुए दिखाई देने लगे,इसकी तस्वीर भी शामिल की है,
हम दोनों की समझ नहीं आ रहा था कि यह क्या बला है,तो गिरधर के कहने पर मेने गाड़ी साइड में रोक कर एक एक्टिवा वाले अंकल से पूछ ही लिया,उन्होंने बताया की इसे पतंग की डोर से बचाव के लिए लगाया जाता है,यहाँ पर पतंगबाज़ी का इतना माहौल रहता है कि अगर इसे ना लगाया जाय तो पतंग की डोर में उलझ कर जान भी जा सकती है,ऐसी दुर्घटना पहले हो चूँकि है,तभी इसे डोर से बचाव के लिए लगाया जाता है,अब जाकर हम दोनों का दिमागी कीडा शांत हुआ।

यहाँ से जैसे जैसे हम अहमदाबाद की और जा रहे थे,आसमान में रंगबिरंगी पतंगों की तादात बढ़ती जा रही थी,बढ़ती भी क्यों न आज मकर संक्रांति जो थी,गुजरात में मकर संक्रांति त्यौहार का बहुत माहौल रहता है,और इस दिन पर पतंगबाजी वह भी अहमदाबाद की,जोकि विश्वविख्यात है।
खुले आसमान में रंगबिरंगी पतंगों का झुरमट देख बहुत अच्छा लग रहा था,ऐसे में पता ही नहीं चला कब अहमदाबाद शहर में आ गये।
हम करीब दोपहर 2.00 बजे अहमदाबाद शहर में पहुच गए थे,अहमदाबाद शहर काफी फेला हुआ है,इसे पार करने में ही हमे 1 घंटे का समय लग गया जबकि मकर संक्रांति की छुट्टी के कारण रोड पर बहुत ज्यादा ट्रैफिक नहीं था।
अहमदाबाद में रुकने या तफ़रीह की हमारी कोई योजना नहीं थी इसीलिए आगे बढ़ते हुए हम सरखेज होते हुए साणंद के लिए रवाना हो गये।
इस तरह हम अब इंदौर से चल कर अहमदाबाद के पार पहुच गये।

यहाँ पहुँचने पर समय दोपहर के 3.30 हो रहा होगा, इस तरह सुबह 5.30 से अब तक 460 कि.मी की दुरी तय कर चुके थे,मतलब पहला लक्ष्य जो कि अहमदाबाद पहुँचना था,उसे पुरा कर चुके थे,फिर भी हमारी दिल्ली यानि कि कच्छ का रण अभी भी करीब 400 कि.मी दुर था।

हमारी अब तक की यात्रा बहुत अच्छी रही,रोड भी सभी जगह अच्छी थी,और गाड़ी की तरफ से भी कही कोई रूकावट नहीं आई,नाहि हमे कोई थकान,तो बस अभी और आगे जाना था...
पर अगर खाने की बात करे तो सुबह से अब तक इंदौर की चिक्की के अलावा हम ने अब तक कुछ और नहीं खाया था,वैसे मुझे सफ़र के दौरान खाने में हल्का खाना ही पसंद है,पर गिरधर भाई को ठीक से खाना ही पसंद है,तो अब हम अहमदाबाद के पास साणंद पहुँचकर कुछ खाने की तलाश करने लगे...
....
अब यहाँ से आगे की यात्रा का वर्णन अगले पोस्ट में जल्द ही करूँगा।
तब तक के लिये अलविदा.....





सुबह-सुबह का मौसम,शानदार रोड...और बुलेट की डुग डुग


सफ़र की साथी

गुड़ तिल चिक्की

मध्यप्रदेश-गुजरात सीमा पर...



डॉ.गिरधर और उसके पिछे शानदार दहोद-अहमदाबाद हाईवे.

गुजरती अंकल और उनकी गाड़ी पर लगी तार की फ्रेम,पतंग की डोर से बचाव के लिए.
अहमदाबाद शहर
सबसे जरुरी आवेदन