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Wednesday, 27 June 2018

उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा भाग-2 दिल्ली के दिलवालों के साथ-ग़ुमनाम फॉसिल पार्क और गुलज़ार विकास नगर



भाग-2

05 जून 2018

इंदौर से दिल्ली की यात्रा की थकान लिए जब कूलर के सामने सोया तो,3 घंटे भी नही सो पाया,शाम 4 बज़े के करीब ही नींद खुल गई।
नीरज ड्यूटी से अभी भी नही आया था,हमारी बात दिल्ली से आज ही शाम को निकलने की हुई थी,दिल्ली से विकासनगर (देहरादून) आज रात तक पहुँच जाने का प्लान था।
थोड़ी देर बाद सामने दरवाज़े में थोड़ी हलचल हुई,मुझे लगा नीरज आ गया...लेकिन वो नीरज नही धीरज था..धीरज,नीरज का छोटा भाई है,मुझे देखते ही "और क्या हालचाल है..डॉक्टर साहब..खैरियत पूछी।" 
खैर इससे पहले हम एक-दूसरे से मिले नही थे..फेसबुक पर दोस्त भी नही थे,लेकिन फिर भी देखते ही बातें शुरू हो गई..धीरज का स्वभाव भी नीरज की तरह सहज़ सरल ही है।

थोड़ी देर बाद दीप्ति ने खाने की व्यवस्था कर दी..खाने में गरमा गरम चपाती,स्वादिष्ट मूंगदाल,बून्दी रायता,इमारती और सलाद था..
स्वाद के चक्कर मे खाना टारगेट से ज्यादा ही हो गया...
खाने के बाद धीरज से फिर से संवाद जारी हो गए,धीरज कुमार भारतीय रेलवे में असिस्टेंट लोको पायलट है..अभी अभी दिल्ली मुख्यालय मे ट्रांसफर हुवा है,इससे पहले राजस्थान के जैसलमेर के पास,किसी बहुत गर्म जगह पर ड्यूटी कर रहा था,इसके साथ ही वह बहुत अच्छा एथलीट भी है..नीचे ग्राउंड में रनिंग वगैरह करने जा रहा था तो मुझे भी चलने को कह दिया..मैंने दीप्ति से नीरज के आने का समय पूछा तो पता चला वो 6 बजे आयेगा,तो में भी धीरज के साथ ग्राउंड में आ गया...
लेकिन ये क्या कूलर वाले कमरे से बहार आते ही फिर से शरीर से पसीना शुरू...जल्दी ही वापस ऊपर आना पड़ा।
शाम के 6 बज गए थे,दीप्ति ने बताया वो अपनी मोटरसाइकिल मोडिफाइड करवा रहे है..मैंने कहा मोडिफाइड करवा के नकली हार्ले डेविडसन बनवायेगा क्या..?? अरे नही नही केवल सीट मोडिफाइड करवायंगे।।
में शास्त्री पार्क में नींद के झोंके खा रहा था,और नीरज कुमार उधर करोल बाग में बुलेट वालो के मजे लेते हुवे,अपनी सीट मोडिफिकेशन की पोस्ट फेसबुक पर शेयर कर रहा था...
मैने मेसेज किया बहुत गलत बात है..!
रिप्लाय मिला-अबे तुभी आजा..करोलबाग तो दिन में देखकर ही गया है..
लेकिन मैंने दिन में ही दिल्ली के ट्रैफिक के बुरे हाल देख लिए थे..फिर से वहीं फ़सने की नादानी भला कैसे करता..
इससे अच्छा तो यही सोया रहूँगा...
इंतजार करते करते फिर से नींद आ गई..
वापस होश सम्हाला तो रात के 9 बज़ गए थे।
लेकिन नीरज अब तक नही आया था,मैंने भी बार बार पूछकर परेशान करना ठीक नही समझा.. सोचा डिस्कवर का उत्परिवर्तन हार्ले डेविडसन के रूप में आज होकर ही रहेगा...
जब समय रात के 9.30 से भी ज़्यादा हो गया तो समझ गया था कि आज यात्रा शुरू नही होगी। अब कल सुबह ही निकलेंगे,यह मेरे लिए भी बहुत अच्छा था,आज ही 950 किलोमीटर गाड़ी चलाकर आया हु,रात को नींद पूरी कर लूंगा,तो आगे की यात्रा के लिए थोड़ी आसानी होगी।
अचानक दरवाजे में फिर से हलचल हुई..
और इस बार नीरज महाराज अंदर प्रवेश कर रहे थे।
मेरा मन,उठकर,गले मिलने,हाथ मिलाने,सेल्फी लेने का बिल्कुल भी नही हुवा..बस पलंग पर बैठा रहा..एकदूसरे को देखकर दोनों हँस दिए..हो गया अभिवादन..!
नीरज घर मे आते ही अपनी पसंदीदा ड्रेस पहनकर मेरे साथ ही पलंग पर बैठ गया..हम लोग आज नही जायँगे ऐसा ऐलान करने की जरूरत नही थी,यह सब को पता था।
खाने की थाली फिर से तैयार थी,लेकिन इसबार केवल नीरज के लिए,मे तो पहले ही टारगेट पूरा कर चुका था..थाली के साथ ही आम की फ़रमाइश भी हो गई..
पलंग पर ही हम तीनों की (में,नीरज,दीप्ति) की मीटिंग शुरू हो गई...सबसे पहले नीरज ने मुँह खोला और कहा..पिछले 8 दिनों से बस इसी यात्रा की तैयारी कर रहा हु,कहाँ जाये कहाँ न जाये के चक्कर मे पूरे मैप को खंगाल लिया..
इस बीच मैंने कह दिया..वो ब्रम्हीताल वाला ट्रैक में कर लूँगा क्या...? इसके पहले कही कोई ट्रैकिंग नही की है।
तो नीरज ने कहा..अगर तेरे को डर है तो ट्रैकिंग नही करते..बाइक से घूमते रहेंगे..तीन दिन गंगोत्री,हरसिल के लिये मुझे दे दो।
बाक़ी तुम अपने हिसाब से प्रोग्राम जमा लो..
ऐसा सुनते ही,में खुशी से गदगद हो गया..लेक़िन कहाँ घूमेंगे..इसके ख्याली पुलाव पकाते पकाते हम चंद्रताल,सचपास,और भी पता नही कहाँ कहाँ घूम आये..
फिर नीरज कहने लगा वो तुम्हारे घुमक्कड़ी ग्रुप में भी पूछ लो..
इस ग्रुप में नया नया हु...खैर नीरज इस ग्रुप के शुरुआती(संस्थापक) सदस्यों में से है...लेक़िन अब ग्रुप में नही है...लेकिन जब से,में देख रहा हु,GDS में से ना तो नीरज की बातें पूरी तरह ख़त्म होती है..ना नीरज के दिल से GDS की बातें..फिर भी दोनों एक दूसरे से दूर दूर रहते है...
खैर...नीरज ने अगर हफ़्ते भर मैप खंगाला है।तो सारी प्लानिंग भी कर ली होंगी..लेक़िन उसकी आदत है सरप्राइज देने की..वो पहले से कभी कुछ नही बतायेगा..लेकिन यह तो पक्का है,कि हर रोज लिंक से हटकर किसी वीरान रास्ते पर और आम पर्यटकों से दूर..सुनसान सी किसी जगह पर जरूर ले जाएगा..
मुझे पता है,करना उसे अपने मन की है,फिर भी हमें फ़ालतू काम मे लगाए रखना है...मैंने कह दिया तीन दिन गंगोत्री हरसिल के..बाकी कही भी घूमते रहेंगे..अभी से कोई योजना नही बनाएंगे।
हमें ट्रैकिंग तो करना नही है..टेंट यही रख देता हूं..तो नीरज कहने लगा..हाँ टेंट यहीं रहने दो..लेक़िन किसने बोला हम ट्रैकिंग 
नही करेंगे..ट्रैकिंग तो होगी।
फिर से संशय...मैंने फिर पूछा भी नही ट्रैक कौन सा करेंगें...सोचा राज़ को राज़ ही रहने दो !
और भी गपशप होती रही...तब तक रात के 11 बज़ गए...कल सुबह जल्दी निकलेंगे...ऐसा कहते हुवे सोने की तैयारी होने लगी,तीनों घुमक्कड़,कूलर वाले कमरे मे जाकर सो गए...सोते ही गहरी नींद लग गई।

06 जून 2018

अचानक से...ओये डॉक्टर...अबे उठ...की आवाज़ आई।तो लगा अभी 2 मिनीट पहले ही तो सोया था।
आँख खुलते ही,पहले नज़र घड़ी में गड़ाई..तो सुबह के 4 बज़े थे,थोड़ा और ध्यान से देखा तो नीरज चक-पक होकर मेरे सामने खड़ा था,उसे देखते ही मेरी नींद,थकान सब छू मंतर हो गई,वो आमतौर पर इतनी जल्दी नही उठता है,आज शायद 3 बज़े ही उठ गया था,तो मेरा भी साथ देना बनता था,आधे घंटे का समय लगा और में भी चक-पक हो गया।
चाय-बिस्किट लेने के बाद,सारा सामान नीचे ले आये,और दोनों बाइकों पर ठीक से बांध लिया,बस फिर क्या था,सुबह के 4.50 बज़े हमारी यात्रा शुरू हो गई।
मुझे पेट्रोल टैंक फुल करवाना था,तो शास्त्री पार्क से निकलते ही पहला काम यही किया..
अच्छा हाँ.. कल की उमस और गर्मी को देखते हुवे,नीरज ने बारिश की भविष्यवाणी कर दी थी,तो रेनकोट छोटे बेग में ही रख लिया।
दिल्ली से निकलते ही हम दोनों की मोटरसाइकिलें सुबह की ठंड़ी ठंड़ी हवा के साथ बातें करने लगी,निकलने के पहले मैंने रूट पूछा तो नही लेक़िन 5 किलोमीटर बाद ही समझ आ गया कि हम सोनीपत-पानीपत होते हुवे आगे जायँगे।
एक घंटे बाद हम 53 किलोमीटर दूर मुरथल के आसपास कही रुक गए,यहाँ से सोनीपत पास ही था,यहीं हमारें चर्चित व्हाट्सएप प्रशासक और घर वापसी विशेषज्ञ संजय कौशिक जी का भी निवास है,कल ही उनका संदेश भी आया था,गुड़गाँव में मिलने के लिए,यह बात नीरज को भी पता थी,तो तीनों की आपसी सहमति से कौशिक जी को फ़ोन कर दिया कि हम आ रहे है..नीरज पहले भी इधर उनसे मिल चुका था,फिर भी व्हाट्सएप पर लोकेशन शेयर कर ली,15 मिनीट बाद हम तीनों कौशिक जी के घर पर थे।हमारे पहुँचते ही कौशिक जी एक अच्छे प्रशासक की तरह तीनों से,गर्मजोशी से मिले,उनके बेटे युवराज़ और भाभी जी से नमस्ते हुई।फिर पहुँचते ही हमारे लिए चाय-बिस्किट-नमकीन और कौशिक जी के लिए तौरी की सब्जी-चपाती की प्लेट सामने आ गई..और इधर-उधर की बातें होने लगी,कौशिक जी की जॉब गुड़गाँव में है,सोनीपत से उनकी ट्रेन का समय भी होने ही वाला था,फिर भी हम सब बैठे बैठे बतिया रहे थें,सबकी नजर अचानक घड़ी पर तो सभी फ़टाफ़ट नीचे आ गए,घर के बाहर ही,नीरज की नई नवेली क़िताब मेरा पूर्वोत्तर का आदान-प्रदान और फिर ग्रुप फ़ोटोग्राफी का आयोजन हुवा..
टाटा-टाटा-बाय-बाय कर सब अपनी अपनी यात्रा पर चल दिये...
बाहर का मौसम अभी भी सुहावना था,ठंडी हवा चल रही थी..सुबह के 7 बज गए थे फिर भी धूप नही निकली थी,निश्चित ही आगे कहीं बारिश हो रही होगी।हम लोग नेशनल हाइवे 44 के 6 लेन दिल्ली-अम्बाला रोड़ पर पानीपत की और आगे बढ़ रहे थे,जैसे कि सुबह शास्त्री पार्क के मौसम विशेषज्ञ ने बारिश की भविष्यवाणी की थी,बारिश शुरू हो चुकी थी,लेकिन इतनी भी तेज़ नही,की आगे बढ़ ना सके।
बीच मे कही रेनकोट पहनने की आपाधापी के बाद में जब मैं फिर से आगे बढ़ने लगा तो मुझें पता ही नही चला कि मैंने नीरज को कब ओवर टेक कर दिया,मुझे लगा वो आगें कही मिलेगा,इस चक्कर में कब करनाल,कुरुक्षेत्र पार हो गया पता ही नही नही लगा।हमे आज विकासनगर (देहरादून) की तरफ़ जाना था,मुझें यह पता था कि पोंटासाहिब होते हुवे जायँगे,तो जहाँ भी इसका दिशा संकेतक आयेगा मुड़ना होगा,बाकि नीरज तो आगे ही है,जहाँ से मुड़ना होगा वो रुकेगा ही,लेक़िन वास्तव में सब इसका उलट ही रहा था,ना तो देहरादून-पोंटासाहिब का दिशानिर्देश कहीं मिला,ना आगे नीरज..
वो तो बेहतर था कि मैंने फोन चालू कर कान में हेंडफ्री लगा रखी थी,नीरज का फ़ोन आया..
उसने अपने चिरपरिचित अंदाज़ में बड़ा सा हेल्लो... बोला और कहा भाई में तेरे पीछे चल रहा हु..आगें शाहबाद आयेगा,वहाँ रुक जाना...
मैंने कहाँ हऊ वही मिलता हु...
हम शाहबाद में मिल गए...और मेरी खिंचाई शुरू..
नीरज-"अरे हमें करनाल से ही यमुनानगर के लिए मुड़ना था,तुम ना तो करनाल में रुके ना ही कुरुक्षेत्र में,ये भी ध्यान नही है कि हम पीछे है,पता है तुम्हारी बुलेट 70 से शुरू होती है और हमारी डिस्कवर 70 पर ख़त्म...फ़ोन नही करता तो तुम तो अम्बाला ही पहुँच जाते..."
में-भी कब तक सुनता... "धीरे से कह दिया भाई सुबह के 10 बज़ने वाले है,मुझें तो ज़ोरो की भूख लगी है,तुम्हें भी लगी ही होगी,चलों आलू के पराठे खाते है।"
इतना सुनते ही नीरज का रूप बदल गया...हाँ, हाँ तो चलो ना,मैंने कब मना किया...
आलू का बना,जो कुछ भी हो..नीरज को प्रिय है,और समोसा,पराठा तो अतिप्रिय...
आलू-पराठे बनते तब तक हमारी आगे की योजना बन गई..
नीरज कहने लगा-जो हुवा अच्छा ही हुवा,इस बहाने नया ग्रामीण रास्ता देखने को मिलेगा.. हम यहाँ से नारायणगढ़,कालाअम्ब होते हुवे पोंटासाहिब जायँगे।
पराठे खाकर फिर से चल दिये,बढ़िया 2 लेन ग्रामीण सड़क मिली.. अब में पीछे ही चल रहा था,रास्ते मे थोड़ी बारिश शुरू हुई तो फिर से रेनकोट पहन लिया,हरियाणा का मौसम आज ग़जब ही ढा रहा था,लेक़िन जैसे जैसे आगे बढ़ रहे थे,इसका असर कम होते जा रहा था,फिर कहीं,बारिश बिल्कुल बंद हो गई,ऐसे में रेनकोट पहने रहना बर्दाश्त नही हो रहा था,काला अम्ब यानी हिमाचल में पहुँचते ही हालत पसीना पसीना हो गई, तो रुककर तीनों ने रेनकोट निकाल दिए,रुककर तीनों हिमाचल प्रदेश की गर्मी को कोसने लगें।
तभी नीरज कहने लगा-अच्छा बताव काला अम्ब में घूमने की जगहें क्या-क्या है..?
मैंने कहा-यहाँ काले आम का बाग़ होगा...लेकिन तुम कहाँ लेकर चल रहे हो ये बताव..
नीरज ने कहा-हम चलने वाले है..फॉसिल पार्क..शिवालिक फॉसिल पार्क..सुकेती।
कच्छ और थार में भी तुम्हें फॉसिल पार्क घुमाया था,यहाँ भी घुमाऊंगा...
मैंने कहाँ-हाऊ..चलो भीया।
काला अम्ब से हम सुकेती रोड़ पर आ गए,5 किलोमीटर बाद ही हम गुमनामी में खोए शिवालिक फॉसिल पार्क पहुँच गए..
यह एकांत सी जगह में बना है,बारिश के मौसम में यह जगह वास्तव में गुलज़ार रहती होगी।
गेट के बाहर ही गाड़ी खड़ी कर प्रवेश कर लिया,प्रवेश टिकिट लेने की जरूरत नही थी,फ्री प्रवेश था।
अंदर दो बड़े से हॉल में मेरूदंडधारी जीवों और वनस्पतियों के जीवाश्म और बहुत से मॉडलों को सुरक्षित और व्यस्थित ढंग से प्रदर्शित किया गया है।दोनों हॉल में आराम से घूम लेने के बाद आकर्षक लग रहे "मनुष्य के विकास क्रम" के एक वॉलपेपर के पास फ़ोटो लेने लग गए..
बाहर भी मेरुदंडधारी जीवों के मॉडल सजाकर कर रखे हुवे थे।
अब यहाँ से हमें विकासनगर की ओर जाना था,नीरज पहले ही मैप का अध्ययन कर चुका था, यहाँ से हमें,वापस काला अम्ब जाने की कोई जरूरत नही थी,सुकेती रोड़ से ही हम आगे चलते हुवे कोलार रोड़ पर आ गए।सड़क कच्ची जरूर थी,लेक़िन कुछ किलोमीटर बचाने के लिए सौदा बुरा नही था।मुख्य मार्ग पर पहुँचते ही छोटे से रेस्टोरेंट पर रुक गए,गर्मी से तीनों के बुरे हाल थे,कुछ नमकीन और माज़ा की बोतल लेकर यही बैठ गए,तो बहुत ही अच्छी अनुभूति हुई।
लेकिन यहाँ भी कब तक बैठे रहते,माज़ा का असर रहते ही निकल जाना बेहतर था।तो फिर चल पड़े और सीधे पोंटासाहिब गुरुद्वारे जाकर रुके,तीनों ने साहिब के दूरदर्शन किये और गलियों में से दो काले चश्मे खरीदते हुवे आगे बढ़ गए।
कुल्हाल(यमुना) ब्रीज पार करते ही हम उत्तराखंड में थे,इस ब्रीज के इसपार हिमाचल, उसपार उत्तराखंड है।अब यहाँ से विकासनगर केवल 20 किलोमीटर ही था।
विकासनगर में प्रवेश करते ही दोनों ओर आ रही आम और लीची की महक़ से हम सराबोर हो गए,सड़क के दोनों ओर पेड़ो पर आम और लीची के झुरमुट लगे थे,यह सब मेरे लिए पहला अनुभव था।
काला अम्ब में ही नीरज ने कह दिया था कि विकासनगर में लंच हमारा इंतजार कर रहा है,तब मुझे अंदाजा हो गया था,किसी मित्र के यहाँ रुकने वाले है,लेकिन यह मित्र कौन है,यह नही पता था,नीरज और दीप्ति मोबाइल नेविगेशन को देखते हुवे आगे चल रहे थे,थोड़ी देर बाद एक घर के बाहर हमारी गाड़िया रुक गई,घर के बाहर से ही उदय झा साहब हमें घर की राह दिखा रहे थे,नीरज और दीप्ति के गृहप्रवेश करते समय उनकी ख़ुशी देखते ही बनती थी,झा साहब,भाभी जी, उनकी दोनों बिटिया..सभी बहुत खुश थे।इस बीच झा साहब से मेरा भी प्रथम परिचय हुवा,इससे पहले उनसे कहीं कोई परिचय नही था,फेसबुक बुक पर भी नही।
झा साहब रहने वाले उदयपुर के है लेकिन अपने घुमक्कड़ मन और प्रकृति के क़रीब रहने की आदत के कारण पहाड़ों के अतिनिकट, शांत शहर विकासनगर में ही बस गए,उनके कुछ फ़ोटोग्राफ़ देखकर अंदाजा हो गया कि वे बेहतरीन फ़ोटोग्राफ़र भी है।
जाते ही ताज़ी लीची का गुच्छ हमारे सामने 
रख दिया गया।नीरज कहने लगा जाव तुम पहले नहाकर आव,फिर लीची को हाथ लगाना। में हाऊ भीया कह कर,यमुना-टोंस के मिश्रित शीतल जल से नहाने चला गया,अब तरोताज़ा होकर झा साहब के साथ लीची खाने बैठ गया,लीची को खाने में जितना आनंद मिल रहा था उतना ही या उससे भी अधिक आनंद लीची को छिलने में आ रहा था,छिलने को बिना ब्रेक किये,अखंड,वन वे छिलाई की जा रही थी।नीरज और दीप्ति भी अपना अपना नंबर आने पर नहाने खिसक लिए,फिर जब तीनों का सुगंधिम पुष्टिवर्धनम हो गया बहुप्रतीक्षित भोजन हमारे सामने आ गया,झा साहब कल शाम से हम सभी का इंतजार कर रहे थे,लेकिन नीरज की बाइक सीट मोडिफिकेशन के कारण सारा प्रोग्राम लेट हो गया था,लेकिन सीट मोडिफिकेशन बहुत जरूरी काम था,पिछली सीट पर बैठकर लंबी दूरी की यात्रा करना,बड़ा दुष्कर होता है,ऐसे सीट पर यह थोड़ा आरमदायक हो जाता है।
लज़ीज खाना ख़त्म करते ही नीरज कहने लगा,मेरी मोटरसाइकिल का पो-पो ख़राब हो गया है,मेकेनिक को बताना होगा,झा साहब कहने लगें चलो बाज़ार ठीक करवा लाते है।मैंने भी गाड़ी धुलवाने का बहाना बना लिया और तीनों साथ मे चल दिये,मेरी देखा-देखी नीरज ने भी गाड़ी की धुलाई करवा ली,नही तो वो अपनी गाड़ी को ऐसे लफड़ों से दूर ही रखता है।हम तीनों गैरेज के बाहर खड़े थे इसी बीच नीरज के एक और मुरीद शिव सरहदी जी भी वही आ गए,आपसी मेलमिलाप के बाद कल हम किस रास्ते से चकराता और उत्तरकाशी जाय,इस बारे में चर्चा होने लगी,गाड़ी धुलाई वाले के पास एयर कंप्रेशर की व्यवस्था नही थी। इसकारण मेरी बुलेट,धुलाई के बाद चालू होने में नख़रे करने लगी,एयर प्रेशर से प्लग साफ कर देते तो तुरंत चालू जो जाती।लेक़िन जब हम सभी ने एक एक किक लगाई तो थोड़ी ही देर में चालू हो गई,लेक़िन यही से नीरज एन्ड कंपनी को बुलेट की बुराई गिनाने का मौका मिल गया,फिर रोज़ उसकी गिनती में हिजाफा ही होते रहा।
खैर किसी तरह गाड़ी झा साहब के घर पहुँच ही गई,यहाँ पहुँच कर चेन में तेल का स्प्रे भी कर दिया,अब गाड़ी रातभर खड़ी रहेगी तो अपने आप सारा पानी सूख जाएगा,सुबह कोई दिक्कत नही।
अब शाम होने लगी थी,अंधेरा भी धीरे धीरे गहरा रहा था।में,नीरज-दीप्ति और झा साहब का पूरा परिवार अपनी अपनी आराम कुर्सी लेकर ओपन-टेरेस-नुमा-आँगन में एक यादगार शाम का आगाज़ करने बैठ गए,धीरे-धीरे झा साहब की पूरी मित्र मंडली अपने परिवार सहित महफ़िल का हिस्सा बनने आती गई।पूरी मण्डली में सबसे रंगीन मिजाज़ शख़्स शिव सरहदी जी थे,उनका साथ पूरी महिला मण्डली दे रही थी,सबसे ज़्यादा चुप में और नीरज ही थे,खैर महफ़िल में गपशप का केंद्र बिंदु नीरज-दीप्ति की घुमक्कड़ी ही थी,तो नीरज तो फिर भी बोल रहा था,लेक़िन मेरे बोलने के लिए तो ज्यादा कुछ नही था,लेक़िन सुनने के लिए बहुत कुछ था।
हमारी महापंचायत 8 बज़े के पहले शुरू हुई थी,रात के 12 कब बज़ गए पता ही नही चला।धीरे धीरे सभी मित्र विदा होने शुरू हो गए,शिव सरहदी जी ने हम तीनों को सुबह आलू पराठा के नाश्ते के लिए आमंत्रित किया तो नीरज ने पूरी गर्दन गोल घुमा दी।तो शिव सरहदी जी ने मस्त अंदाज़ में कहा-यू..कर के यू..सीधे फुर्ररर ना हो जाना..सुबह आना जरूर।उनका प्रेम-भाव ही था,कि हमें सुबह उनके यहाँ जाना ही पड़ा।
रात की महफ़िल जब ख़त्म हो गई तो सब सोने की तैयारी में थे,लेकिन अभी रात का खाना भी बाक़ी था,झा साहब ने अपने आतिथ्य मे कोई कसर नही छोड़ी थी,हम भी उनके कहने पर खाने में जो सामने आ रहा था उसे उदरस्थ करते जा रहे थे।
खानपान से फ़रिख होते ही सीधे बिस्तर ही दिख रहा था,पड़ते ही नींद लग गई...


सुबह सुबह संजय कौशिक जी के साथ,में और नीरज-दीप्ति

नीरज,संजय जी और नीरज की लिखी क़िताब

शाहबाद से नारायणगढ़ के लिए बढ़िया ग्रामीण सड़क

बस यूं ही...


शिवालिक फॉसिल पार्क सुकेती





फॉसिल पार्क में प्रदर्शित मॉडल

न्यू जेनरेशन



इसी ब्रीज के एक और उत्तराखंड और एक और हिमाचल..

विकासनगर के आसपास..




झा साहब के घर की बगिया में..






बाई ओर से झा साहब,नीरज और शिव कुमार जी





Tuesday, 19 June 2018

उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा-भाग 1-INDORE TO DELHI ON BIKE

उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा भाग - 5 टाइगर फॉल चकराता
उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा भाग-6 नज़ारे चकतारा घाटी और लाखामंडल के
भाग 7 धरासू-उत्तरकाशी होते हुवे गंगनानी के प्राकृतिक गर्मपानी कुंड(ऋषिकुंड)
उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा भाग-8 दर्शन गंगोत्री धाम के 
उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा भाग - 9 सातताल ट्रैक व मुखबा भ्रमण
उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा भाग- 10 धराली से इंदौर वापसी
दिसम्बर 2016 में थार मोटरसाइकिल यात्रा पर गया
था,उसके साथ ही ओरछा महामिलन में भी आहुति
डाली थी।बस उसी के बाद ही सभी प्रकार की घुमक्कड़ी पर विराम लग गया था।उसके बाद मार्च 2017 में पिता बनने का परम सौभाग्य मिला,और इस जिम्मेदारी को मैने बहुत अच्छे से जिया ...
अपनी संतान को बड़ा करना दुनिया के सबसे कठिन कामों में से एक है,और यह काम ना तो माँ अकेले करती है..ना पिता..दोनों को मिलकर परिवार को साथ लेकर करना होता है,और हम सभी इस काम को मिलकर कर रहे थे।

खैर...हमारा बेटा कियान अब एक वर्ष से अधिक का हो चुका है,और अब में कुछ समय के लिए ही सही,लेकिन घुमक्कड़ी के मैदान में उतर सकता था..
और में उत्तराखंड के पहाड़ो में मोटरसाइकिल से जाने के मौके की तलाश में था...
एक दिन घुमक्कड़ मित्र नीरज कुमार की किसी फेसबुक पोस्ट पर कुछ टिप्पणी की तो उन्होंने पूछ लिया घुमने कब निकल रहे हो..साथ ही 23 जून से 27 जून हरसिल-नेलांग वैली (उत्तराखंड) यात्रा पर चलने के आमंत्रित किया,लेकिन यही तारीख़ पापा के आँवलखेड़ा (आगरा) जाने की भी थी..तो इन तारीख़ पर मेरा जाना सम्भव नही था।
फिर नीरज ने बहुत धीरे से कहाँ-"वैसे हम 5 जून को भी दिल्ली से हरसिल-गंगोत्री तरफ जा रहे है और 2 दिन की ट्रैकिंग भी होगी"। मैंने उससे भी धीरे से फुसफुसाया "में भी चलु क्या ?"और नीरज का जवाब था "हाँ चलो।"
नीरज के हाँ कहते ही मेरी उत्तराखंड-हरसिल-गंगोत्री-मोटरसाइकिल यात्रा पर मोहर लग गई।

इंदौर से दिल्ली और वापसी मे दिल्ली से इंदौर का सफर में अकेले करूँगा और दिल्ली-गंगोत्री-दिल्ली के सफर नीरज और उनकी श्रीमती जी साथ होंगे।
नीरज कुमार के साथ यात्रा करने का पता नही कौन सा रासायनिक संयोग बन जाता है।उनके साथ यह छठी यात्रा थी।और हर यात्रा में हमारा तालमेल और बेहतर रहता है..
इस यात्रा में श्रीमती दीप्ति सिंह(नीरज की पत्नी) भी साथ रहेंगी,इससे पहले पचमढ़ी मोटरसाइकिल यात्रा और थार मोटरसाइकिल में वे साथ रह चुकी है,तो इसबार मेरी तरफ से  थोड़ा और सहज रहने का प्रयास रहेगा..इससे पहले मेरे दिमाग मे यही आता था,कि में इन दोनों के बीच कबाब में हड्डी बन कर क्या करूँगा।
इस यात्रा में ट्रैकिंग भी शामिल थी,तो डेकाथेलॉन से केचुआ के ट्रेकिंग शूज़ ले आया,टेंट तो पहले से था ही,बाकि जो लगेगा वह शास्त्री पार्क दिल्ली से मिल जायेगा,बाकि और कुछ खास तैयारी करना नही थी।

हाँ..एक ख़ास तैयारी और करना थी,मोटरसाइकिल को भी सर्विस करवाना था,तो अपनी बुलेट को में सर्विस सेंटर ले जाने के बजाय पास के ही मैकेनिक के पास ले जाता हूं..
सर्विस सेंटर वालो के पास ले जाना यानि कम से कम एक दिन वही बैठे रहो या गाड़ी छोड़कर आ जाव। तो पास के मैकेनिक से यात्रा के दो दिन पहले जनरल सर्विस,ऑइल चेंज,पिछला टॉयर चेंज,व्हील अलाइनमेंट जैसे जरूरी काम करवा लिए।
वक़्त का पता ही नहीं चला और 4 जून आ गई,दिल्ली से 5 जून की शाम को निकलने की बात हुई थी,उसी के अनुसार मेरी योजना इंदौर से 4 जून को निकालने की थी।
जून के महीने में अपने देश के किसी भी मैदानी इलाकों में आपस मे एक दूजे से अधिक गर्म रहने की होड़ सी मची रहती है।इंदौर और दिल्ली भी इस दौड़ में बने रहते है।और मुझे तो जयपुर और राजस्थान के बड़े हिस्से से भी गुजरना था।तो ठान लिया था...कि दिन के समय कम से कम गाड़ी चलाऊंगा,अधिकतम रात में ही चलूंगा।
इससे पहले भी लंबी मोटरसाइकिल यात्रा कर चुका हूं,तो मुझे पता था 900 किलोमीटर से अधिक इंदौर से दिल्ली की यात्रा कम से कम 18 घंटे जरूर लगेंगे।

04 जून 2018

में 03 जून रविवार को देवास(ससुराल) चले गया था।दीप्ति (मेरी पत्नी) और बेटा कियान वही थे।
यात्रा से पहले सब के साथ अच्छा समय बिताया, लेकिन गड़बड़ यह हो गई कि सभी ने मुझे वही रोक लिया।मेरी योजना रात में पैकिंग करने की थी,लेकिन कोई बात नही यह काम मैंने सुबह जल्दी आकर कर लिया।
पैकिंग कर के निपटा ही था कि नीरज का मैसेज आ गया..."आज ही चल देना,देवास मत रुकना और रात तक कम से कम ग्वालियर आ जाना।"
मेरे जवाब थे...
"भाई शाम को 4 के पहले निकलूंगा,देवास तो कल ही हो आया और जयपुर होते हुवे आऊंगा।"

वैसे इंदौर से दिल्ली पहुँचने के 3 प्रमुख रास्ते है।

1.इंदौर-आगरा-दिल्ली(शास्त्रीपार्क)-850 किलोमीटर।
इस रास्ते मे इंदौर से आगरा तक अच्छी सड़क की कोई ग्यारंटी नही थी और रात में चलना सुरक्षित भी नही है।

2.इंदौर-कोटा-जयपुर-दिल्ली-835 किलोमीटर।
इस रास्ते से इंदौर-जयपुर का सफर (बस द्वारा)कर चुका हूं,तब झालावाड़-कोटा रोड़ की हालत बहुत खराब थी।सुना है अब रोड़ बन रहा है,लेकिन पूरा नही बना है।

3.इंदौर-नीमच-चित्तौड़-जयपुर-दिल्ली-
900 किलोमीटर।
यह रास्ता सबसे लंबा जरूर है,लेकिन पूरा रास्ता 4 लेन और 6 लेन बना हुआ है,रात में भी गाड़ी चला सकते है,में इसी रास्ते से दिल्ली तक का सफर करूँगा।

04 जून को क्लीनिक में दिन का काम कर के दोपहर 2 बजे तक घर पहुँच गया,बिना इच्छा के थोड़ा सा खाना खाया और गाड़ी पर समान बांधा तब तक दोपहर के 3 बज गए,3.30 बजे मम्मी पापा से अलविदा कह कर में इंदौर से दिल्ली के लिए प्रस्थान कर चुका था।
घर से निकलते ही पेट्रोल टंकी पूरी भरवाई और सुपर कॉरिडोर होते हुए उज्जैन रोड़ पर गाड़ी दौड़ाने लगा।अभी शाम नही हुई थी और गर्मी बहुत थी,लेकिन सर से लेकर पेर तक का हिस्सा ढ़का हुवा था।इसलिए बहुत ज्यादा परेशानी नही होनी थी।

इंदौर से उज्जैन बढ़िया 4 लेन रोड बना है।उज्जैन के बाद मुझे उन्हेल-नागदा-जावरा रोड़ पर जाना था,तो उज्जैन से बायपास रोड़ पर आ गया,जब जावरा रोड़ पर पहुँचा,इंदौर से 70 किलोमीटर की दूरी तय कर चुका था,यही पेट्रोल पम्प पर पानी पी कर,5 मिनिट का आराम लिया और फिर से चल पड़ा...
अब उज्जैन से जावरा का सफर 2 लेन रोड़ पर करना था,रात में इस रोड़ पर अच्छी खासी परेशानी होती है,लेकिन दिन में आराम से चल सकते है,बस 2 लेन रोड़ के अनुसार ही अपनी गति बनाये रखें,में इस रोड पर 70 किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड आगे बढ़ते जा रहा था।
शाम 6.30 बजे के करीब जावरा पहुँच गया।अब मुझे नयागाँव-इंदौर 4 लेन रोड़ पर नयागाँव (नीमच-निम्बाहेड़ा) की और आगे बढ़ना था।घर से निकले 3 घंटे से ज्यादा समय हो गया था और अब तक गाड़ी से उतारा भी नही था,तो गाड़ी से उतर कर रोड़ किनारे ही खड़ा हो गया,कुछ सेल्फी भी ली,इस बहाने 10 मिनिट का आराम भी हो गया।
थोड़ा सा आराम कर सफर फिर से शुरू किया,रोड़ बढ़िया 4 लेन था,तो 70-80 के बीच वाली गति से आगे बढ़ता रहा।
जावरा-मंदसौर-नीमच बेल्ट में अफ़ीम की खेती बड़े स्तर पर होती है,नतीज़न अफ़ीम की बढ़िया पैदावार भी होती है,और उसके साथ साथ अवैध सप्लाय का कारोबार भी खूब होता है।इसी कारण से मध्यप्रदेश-राजस्थान सीमा पर कभी कभी नाका बंदी कर के पूछताछ होती रहती है।
इन सबसे बचने के लिए में जल्दी से जल्दी निम्बाहेड़ा पार होना चाहता था।जावरा से निम्बाहेड़ा की दूरी 138 किलोमीटर है।ट्रैफिक भी बहुत ज्यादा नही था।
9 बजे से पहले निम्बाहेड़ा पार कर लिया।इसकी खुशी मनाई भी नही कि पुलिस वालों की गेंग नाका बंदी कर खड़ी दिख गई और मुझे भी रोक लिया।
पुलिस वालों से निपटने का आसान उपाय है कि जो पूछे उसका सीधा जवाब पूरे आत्मविश्वास के साथ दे दो...आगे प्रभु इच्छा...!
पुलिस वाले ने सबसे पहले पूछा किधर से आये हो ?
मैंने कहाँ-इंदौर से।
कहाँ जावगे इन्नी गर्मी में..?
मैंने कहाँ जयपुर।
तो पूरी रात गाड़ी चलावगे..?
नही जी..! भीलवाड़ा पहुँच के रुक जाऊँगा।
 (बस यही एक झूठ बोलना पड़ा)
क्या करते हो..?
डॉक्टर हु...
अच्छा ठीक है । जाव जाव। आराम से जा जो..

नाकाबंदी से निपटकर आगे चित्तोड़गढ़ की और बढ़ने लगा।निम्बाहेड़ा से चित्तोड़ की दूरी 38 किलोमीटर के करीब ही है।जब चित्तौड़ शहर मे प्रवेश किया तो रात के 10 बजे थे,लेकिन हर और सन्नाटा था,दुकाने बंद हो चुकि थी।लगातार गाड़ी चलाते हुवे 6 घंटे से अधिक हो गए थे,कुछ थकान और थोड़ी भूख भी लग रही थी।शहर से बाहर निकलते ही ढाबों की श्रृंखला दिखाई दी,बस यही गाड़ी टेक दी।
अब एक दो घंटे के आराम की जरूरत थी,रुककर सबसे पहले कुछ जरूरी फ़ोन (घर पर) कर लिए।और खटिया पर पड़ गया,थोड़ी देर बाद ठीक लगने लगा तो चाय के लिए कहा लेकिन ढ़ाबे वाले ने इन्कार कर दिया.. फिर खाने का पूछा तो पता चला केवल दाल-बाटी-छाछ मिल पायेगा।
लेकिन मुझे तो थोड़ा आराम कर के आगे बढ़ना था,दाल-बाटी खा ली तो नींद आयेगी।मेरे पास इसका ईलाज था, ढ़ाबे वाले से कह दिया भाई सा एक काम करो केवल दाल दे दो,बाटी रहने दो।
मम्मी ने जिद्द करके पराठे पैक कर दिए थे,वही पराठे निकाल कर दाल के साथ खा लिए।
यहाँ अभी भी बहुत गर्मी थी,लेटे लेटे भी पसीना आ रहा था,गला सुख रहा था,खाने के बाद 2 गिलास छाछ के पी गया,आर ओ वाटर के कैम्पर दिखाई दिए तो यही से अपनी पानी की बोतल भी भरवा ली।
खाना खाने के बाद भी बहुत देर लेटा रहा।
मेरी यात्रा की जानकारी मेरे घुमक्कड़ दोस्तो को भी थी,यही प्रतीक गाँधी (मुम्बई) का भी फ़ोन आ गया...
फिर व्हाट्सएप ग्रूप "घुमक्कड़ी दिल से.." में चेटिंग होने लगी,तो सलाह मिली रात को आराम करलो कल सुबह आगे जाना..लेकिन यहाँ रुककर आराम करने मे कई दिक्कतें थी।
साधारण कमरे में गर्मी से बुरा हाल होता,तीन-चार घंटे के लिए ए.सी कमरा लेना महँगा सौदा होता और फिर कल दिन की गर्मी और दिल्ली का ट्रेफ़िक भी दिमाग मे था।
ढ़ाबे पर खाने के बाद आराम कर के फिर से तरोताजा था। तो फिर से आगे चल पड़ा।अब की बार सोच लिया था कि हर घंटे में चाय कोल्डड्रिंक पीते पीते आगे बढूंगा।इंदौर से चित्तौड़(340 किलोमीटर) साठे छह घंटे में आ गया था,मतलब प्रतिघंटा 50 किलोमीटर से भी अधिक चल रहा था,जल्दबाजी करने की कोई जरूरत नही थी।

चित्तोड़ शहर से निकल कर उदयपुर-किशनगढ़ रोड़ पर आ गया,चित्तोड़ से किशनगढ़(200 किलोमीटर) तक इसी रोड़ पर चलना है।वैसे यह 4 लेन रोड़ है,लेकिन 6 लेन रोड़ में बदलने का काम चल रहा है।
चित्तोड़ से निकलते ही पेट्रोल टंकी पूरी भरवा ली और दो बार चाय-कोल्ड्रिंक का ब्रेक लेते हुवे किशनगढ पहुँच गया।
किशनगढ से दिल्ली तक का सफर स्वर्णिम चतुर्भुज प्रसिद्ध NH-8 पर होगा,यह शानदार 6 लेन रोड़ है।
NH-8  शुरु होते ही ढाबों की श्रृंखला दिखाई दी,एक गुमनाम से ढ़ाबे पर कम से कम तीस मिनीट का आराम का मूड बना कर खटिया पर लेट गया,ढ़ाबे वाला भाई तेज़ आवाज में टी.वी पर कोई मूवी देख रहा था,फिर भी कब झपकी लग गई पता नही लगा। 
उठते ही चाय की फरमाइश कर दी,ढ़ाबे वाले से बात करने पर पता लगा कि इस रूट पर दिन में ट्रेफ़िक बहुत कम हो जाता है, गर्मी के कारण,ट्रक वाले भी रात में ही चलना पसन्द करते है,इसलिए वो भी रातभर ढाबा चालू रखता है और दोपहर में आराम करता है।वैसे दिन में रेतीले तूफ़ान भी चलते रहते है,कुल मिलाकर अब मुझे रात में चलने के फ़ायदे नज़र आ रहे थे।
उधर दिल्ली से नीरज कुमार सोते जागते मुझे ट्रेक कर रहा था,उसे अपनी स्थिति बताई,भाई किशनगढ़ पार हो गया हूं..उसे मेरी आदत पता है,फिर भी औपचारिकतावश कही रूम लेकर आराम करने को कह दिया।मैंने कह दिया"भाई गर्मी बहुत है,कमरा नही लूंगा ढाबों पर आराम करते करते आगे बढ़ रहा हु।
यहाँ रुके मुझे 30 मिनिट से ज्यादा हो गए थे।फिर से रिफ्रेश था।घड़ी देखी तो रात के 3 बजे थे।
बड़ी मोटरसाइकिल यात्राओं में छोटे छोटे लक्ष्य बनाकर आगे बढ़ना,मुझे बहुत अच्छा लगता है,अगला लक्ष्य जयपुर था।
अच्छा हाँ अपने एक घुमक्कड़ मित्र देवेन्द्र कोठारी जी का निवास भी जयपुर मे ही है।उनका संदेश भी आया था कि भाई मिलते हुवे जाना,घर ही आ जाव तो और अच्छा।लेकिन जयपुर पहुँचने का मेरा समय ऊटपटांग था,सुबह 4-5 बजे उन्हें उठाना मुझे ठीक नही लगता,और फिर जितना रुकूँगा,उतना अधिक धूप में गाडी चलाना पड़ेगी,इसलिए आते समय जरूर मिलने का वादा कर लिया, अब ये वादा कब पूरा होगा,ये न उन्हें पता है,न मुझे,लेकिन पूरा जरूर होगा..!! ये हम दोनों जानते है।
में NH-8 पर ही आगे बढ़ते जा रहा था,सुबह जब थोड़ा थोड़ा उजाला होने लगा तब में जयपुर शहर पार कर दिल्ली की ओर अग्रसर हो रहा था।
इंदौर से प्रस्थान किये 12 घंटे से ज़्यादा हो गये थे,अब थोड़ी थकान महसूस हो रही थी,बीच मे ही कही रुककर इधर उधर के फ़ोटो ले लिए,शहर ख़त्म होते ही ढाबों की श्रंखला दिखाई दी...
ढ़ाबे पर गाड़ी टिकाना, फिर खटिया पकड़ना फिर चाय की फरमाइश करना,और तरोताज़ा होकर फिर चल पड़ने की मानों शरीर को आदत सी हो गई थी।इसबार भी बिल्कुल यही किया और फिर दिल्ली की ओर आगे बढ़ता रहा।
जैसे मेने बताया था,में NH-8 पर गाड़ी चला रहा हु,यह एक शानदार 6 लेन हाइवे है,जयपुर से निकल कर कोटपूतली कब पार हो गया पता ही नही लगा।
जब नीमराना से गुजर रहा था,तब घड़ी देखी तो सुबह के 8 बज रहे थे,और धूप अपने पूरे रंग में थी।ऐसा लग रहा था जैसे दिन के और मेरे,दोनो के 12 बज गए हो...ऐसे में गाड़ी अपने आप ही रोड़ किनारे एक बढ़िया से ढ़ाबे पर रुक गई।
यहाँ गाड़ी को खड़ी कर बहुत प्यार से निहारा तो ऐसा लगा जैसे वो कह रही हो बस करो मालिक। मैंने भी कह दिया तु आधा घंटा आराम करले..फिर चलेंगे दिल्ली...जोकि अब दूर नही है।
ढ़ाबे पर जाते ही वॉशरूम का रास्ता पकड़ा और पूरे शरीर पर पानी मार लिया.. फिर वही खटिया..लेकिन इस बार चाय की जगह बूंदी रायते की बारी थी।बूंदी रायता खत्म होते होते 8.30 बज चुके थे। 
अब यहाँ से बस दिल्ली शास्त्री पार्क नजर आ रहा था।लेकिन अब यहाँ से शास्त्री पार्क की मंजिल आसान नही थी।नीमराना से गुड़गांव तो आसानी से पहुँच गया।लेकिन यही से बढ़िया ट्रैफिक शुरू हो गया,फिर भी किसी तरह ट्रैफिक के साथ बहते जा रहा था।
सुबह 10 बजे में गुड़गाँव में था।
गूगल मैप पर नीरज के घर का रास्ता इंदौर से देखा था तो यह समझ गया था कि गुड़गांव वाले रोड़ पर आख़री तक बने रहना है।
तो में इसी रोड़ पर चले जा रहा था।लेकिन दिल्ली में प्रवेश करते ही दसों दिशाओं में रास्ते और फ्लाईओवर देख दिमाग से पूरा मैप वाश हो गया। सोचा गूगल नेविगेशन चालू कर लेता हूँ लेकिन जब मोबाइल निकाला तो बैटरी 20% से कम बची थी,और चार्जिंग का कोई जुगाड़ भी नही था।इसलिए नीरज को फोन कर के रास्ते की जानकारी लेना बेहतर समझा।
उसने बता दिया शास्त्री पार्क मैट्रो स्टेशन आ जाव,धौलाकुआं और करोलबाग होते हुवे..
गुड़गांव रोड़ से करोलबाग तक के दिशानिर्देश रोड़ पर मिल रहे थे,ट्रेफ़िक और भीषण धूप-गर्मी-उमस का सामना करते करते करोल बाग तो पहुँच गया।लेकिन अब यहाँ से शास्त्री पार्क कैसे जाया जाए यह समझ नही आ रहा था।ऑटो वाले से पूछा तो पता चला पहले तीस हजारी कोर्ट और उसके बाद शाहदरा होते हुवे जाना होगा,इसके लिए पहले तो करोलबाग की गलियों से बाहर निकला,फिर तीस हजारी और शाहदरा होते हुवे शास्त्री पार्क स्टेशन पहुँच गया,यहाँ से नीरज को फ़ोन किया तो पता लगा जनाब दिन की ड्यूटी कर रहे है,तो फ़ोन पर ही रास्ता समझा और पास में ही मैट्रो क्वाटर के E ब्लॉक की ओर चल दिया,ज्यादा खोजबीन करता उससे पहले ही नीरज की वाइफ दीप्ति ने मुझे आवाज लगा दी।किस्मत से वो उस समय नीचे ही थी।
फटाफट गाड़ी से सामान खोला और लंबी गहरी सांस ली,पूरा शरीर पसीने से लथपथ था,समय देखा तो दोपहर के 12 बज रहे थे,मतलब घर से निकले 20 घंटे हो चुके थे,गाड़ी के मीटर में देखा तो 944 किलोमीटर आ चुका था,इसमे सबसे ज्यादा थकान गुड़गांव से शास्त्री पार्क के 50 किलोमीटर में हुई,इसे तय करने में दो से ढाई घंटे का समय लग गया।
ऊपर फ्लेट में घुसते ही 1 बड़े पंजाबी गिलास में भरे रुह-अफजा से स्वागत हुआ,शरीर को इसकी जरूरत भी थी।अब आराम से नहाकर अपना हुलिया सुधारा और कूलर के सामने लगे पलंग पर पड़ गया,दीप्ति ने खाने के लिए पूछा तो मैंने निंद पूरी कर के खाने का कह दिया...




इंदौर से निकलते समय..

मंदसोर के पास किसी जगह से...


आराम करने के बहाने सेल्फी...या सेल्फी के बहाने आराम...


सूर्यास्त की झलक.. मेरी आँखों मे..





चित्तोड़गढ़ में रात का भोजन.. घर से लाये पराठे और पता नही कौन सी दाल

जयपुर मे कहीं...

दिल्ली शास्त्री पार्क में...

Monday, 18 June 2018

कच्छ-सफ़ेद रण मोटरसाइकिल यात्रा भाग-2


जैसा की पहली पोस्ट मे आपने पढ़ा कि में ओर गिरधर,कच्छ यात्रा की शुरुवात इंदौर से 15 जनवरी 2015 को सुबह 5.30 बजे कर चुके थे। दोपहर के 3 बजे हम 450 कि.मी की दुरी तय कर अहमदाबाद पहुँच गये थे।
अहमदाबाद से साणंद तक की 15 कि.मी की दुरी हम 45 मिनीट में कर पाये,यहाँ पहुँचते पहुँचते समय 3.45 हो गया था।
सुबह से अब तक हम लगातार चलते जा रहे थे,बिना कही चाय-नाश्ता किये,गिरधर भाई भुखे नहीं रह पाते है,और में उनके विपरीत लम्बी बाइक यात्रा में खाना पसंद नहीं करता हु,फिर भी साथी की खातिर मैने साणंद में खाना की जगह खोजना शुरू किया,इसबीच एक पानीपुरी का स्टाल देख मेरा मन किया कि गुजरात की पानीपुरी का स्वाद लिया जाय,स्वाद बुरा तो नहीं था,पर इंदौर की तुलना में काफी फीका था।
गिरधर का मन पूर्ण भोजन करने का ही था,तो हम साणंद में रेस्टोरेंट खोज रहे थे,पूरा साणंद पार हो गया पर रेस्टोरेंट या भोजनालय नहीं मिला,कही दाबेली मिली तो कही पाव भाजी...
बहुत पुछने पर किसी ने बताय की बायपास के पास मुनिश्री आश्रम चले जाइये,वहा भी गये तो पता लगा शाम 6 बजे भोजनालय शुरू होगा।
थककर गिरधर नाश्ता करने पर ही राजी हो गया,आश्रम के सामने ही रेस्टोरेंट था,कचोड़ी,समौसे से लेकर पूरा गुजरती नाश्ता मतलब गोटे,फाफड़ा उपलब्ध था लेकिन हमने कचोड़ी ही ली,उसका स्वाद भी बहुत अच्छा नहीं था,अब इन्दोरियो को इंदौर के अलावा और कही की कचोड़ी इतनी आसानी से कहा आना थी,इसीलिए एक कचोड़ी के बाद कुछ नहीं लिया।
अब यहाँ से हमे पहले वीरमगाम फिर धांगध्रा की और जाना था,शाम के 4.15 बजे हम साणंद से रवाना हुवे।
रोड स्थिति के बारे मे फिर से बता देता हु,हम एक बार फिर से फोर लेन रोड पर थे,ट्रैफिक भी बहुत कम था,तो 80 की स्पीड से आगे बढ़ते रहे।
बहुत ही कम समय मे वीरमगाम पहुँच गये,यही पेट्रोल फुल टैंक करवाया,इंदौर से पेट्रोल फुल टैंक करवाया था,और अहमदाबाद के बाद रिज़र्व लगा था,माइलेज 55 के करीब रहा,जोकि बुलेट के लिहाज से आदर्श है,एक बात और,मध्यप्रदेश की तुलना मे गुजरात में पेट्रोल 5 रुपये सस्ता था,तो थोडा खुश होना तो बनता था,यही तो अंतर होता है एक विकसित और विकासशील राज्य मे।
साणंद से गाड़ी गिरधर चला रहा था,मुझे पीछे बैठकर में नज़ारे देख रहा था,इसीबीच सड़क किनारे ढ़ाबे नजर आये,गिरधर को भी बताया,उसे भी पछतावा हो रहा था कि,साणंद की कचोड़ी से बेहतर तो यही खाना खा लेते।
खेर...
वीरमगाम के बाद हम धांगध्रा पहुँचे,यहाँ पहुँचने पर समय 6.10 हो रहा था,पर दिन अभी ढला नहीं था,क्योकि हम भारत के सबसे पश्चिमी छोर की और थे,इस ओर सूर्य अस्त देर से होता है,मध्य भाग कि तुलना मे।
इस तरह इंदौर से प्रस्थान किये हमे 11 घण्टे हो चुके थे,और करीब 550 कि.मी दुरी तय कर चुके थे।
धांगध्रा बायपास पर ही 10 मिनीट रूककर,गाड़ी का एक निरीक्षण किया और हवा चेक करवाई,रुके ही थे तो चाय की चुस्की भी ले ली।
औऱ आगे बढ़ने की तैयारी कर ली,भुज यहाँ से 220 कि.मी और था,भुज तो नहीं पर करीब 100-150 कि.मी और जा सकते थे ।
पर यही पर गिरधर भाई कहने लगे,अब बस..यही रूम लें लेते है,अंधेरा भी होने वाला है, छोटा सा क़स्बा हे...
 मैने एक बार फिर से समय देखा...
अभी शाम के 7 भी नहीं बजे थे,हम देश के पश्चितम हिस्से की और थे,अभी सूर्य देव ने भी अलविदा नहीं कहा था,मेने कहा नहीं अभी और चलते है...
गिरधर ने थोड़ी ना नकुर की लेकिन फिर बैठ गया...
यहाँ से आगे भी बेगर ट्रैफिक के फोरलेन हाइवे था,तो 80 किलो मीटर प्रति घंटे की गति आराम से बनी हुई थी,करीब 1 घंटे ने ही हम मालिया पहुँच गए,रुकने के लिए रूम का पूछा,तो राहगीर ने हाइवे पर ही कई होटल,लॉज दिखा दिए,पहले लॉज में ही 300 रुपए में बढ़िया कमरा मिल गया।
नीचे ही रेस्टोरेंट था,बहुत थक चुके थे,पुरे दिन से मोटरसाइकिल पर थे,650 किलोमीटर के लगभग दुरी तय की थी आज...
तो  खाना भी कमरे में ही बुलवाया,शाही पनीर,दाल तड़का और चपाती, 280 का बिल बना,खाना खाते ही चिर निद्रा में लीन हो गये।
सुबह  उठते ही कच्छ के रण का बचा हुवा सफ़र शुरू करेंगे।
रात को कब नींद आ गई पता ही नहीं चला।
लेकिन हाइवे पर ट्रको की आवाजाही के कारण नींद जल्दी खुल भी गई,वैसे तो अलार्म लगा के सोये थे,लेकिन ट्रको की पो पो ने उसे बजने ही नहीं दिया।
5 बजे के करीब नींद खुल गई,गर्मपानी का हीटर चालू कर के नीचे रेस्टोरेंट में चाय पी और गिरधर को भी उठा दिया।
दोनों तैयार होकर नीचे पहुँचे तब तक सुबह के 7 बज चुके थे,पर हम मध्यप्रदेश निवासी अब भी अँधेरा देख कर आश्चर्यचकित थे,कल शाम को देर तक अँधेरा नहीं हुवा और अब सुबह 7 तक उजाला नहीं हुवा,देश का पश्चितम हिस्सा है ऐसा होना जायज़ है, वैसे देश के पूर्वोत्तम हिस्से गवहाटी में इसका उल्टा होता है, सुबह उजाला जल्दी हो जाता है, और अँधेरा भी जल्दी हो जाता है।इससे यहाँ की दिनचर्या भी होती ही होगी,इसलिये देश के इन दोनों हिस्सों का टाइम जोन अलग अलग होना चाहिए,खेर हम दोनों यह सोचते 2 मालिया से हमारी फटफटी से आगे निकल चुके थे।
मालिया के थोडा आगे ही नमक के खेत मिलना शुरू हो चुके थे,देश के जरूरत का नमक बड़ा हिस्सा यहाँ तैयार होता है।
आज के लिए हम तय कर चुके थे की बारी बारी से दोनों 100-100 किलोमीटर फटफटी चलायंगे।
गिरधर को ठण्ड सहन नहीं होती है, उसे गुजरात की ठण्ड भी ज्यादा लैह रही थी,इसलिए सुबह शुरुआत मेने की और भचाऊ पहुचने के बाद गाड़ी उसके हवाले कर दी।
भचाऊ के बाद रोड की स्थिति कल जैसी तो नहीं थी,लेकिन बहुत बुरी भी नहीं थी,ठीकठाक 2 लेंन रोड था।
भुज पहुँचते 2 हमे 10 बज चुके थे।
वेसे तो भुज में भी बहुत कुछ हे देखने को,लेकिन इतना समय नहीं था,तो हम रुके ही नहीं सीधा कच्छ का रास्ता पकड़ लिया।
मंजिल कच्छ का सफ़ेद रण और रेगिस्तान ही था।
भुज के बाद ही आसपास का परिदृश्य बदलने लगा था,रेगिस्तान की शुरुआत हो चुकी थी,इस परिदृश्य में तीर के सामान सीधी सड़क पर हमारी फटफटी भागी जा रही थी।
कब हम देश के सबसे बड़े जिले कच्छ में प्रवेश कर गए पता ही नहीं चला।
स्वागत द्वार बाह फैलाये हमारी प्रतीक्षा कर रहा था,हमने भी उस द्वार को निराश नहीं किया,वहीँ मोटरसाइकिल रोकी और इस प्रथम मिलन की बहुत सारी फोटो भी खिची।
बस अब तो जल्दी थी सफेद रण में पहुँचने की,गिरधर ने एक व्यक्ति से पूछा भाई कच्छ का रास्ता कौन सा है,उसने कहा भाई यह कच्छ ही है, आप कहाँ जावेगें, फिर मुझे याद आया अरे इससे सफ़ेद रण का पूछो।
फिर पूछा तो उसने रास्ता बताया।
दोपहर के 12 बजे हम सफ़ेद रण या धुरडो पहुँच गए।
कच्छ का सफ़ेद रण अब हमसे ज्यादा दूर नहीं था,लेकिन वहाँ तक पहुँचने के लिए कुछ औपचारिकता पूरी करनी थी।
गुजरात टूरिज़्म के कार्यालय गए और वहाँ से हम दोनों की और फटफटी का प्रवेश शुल्क जमा किया और पावती लेली,होगई औपचारिकता पूरी इस हेतु क्लर्क ने गाड़ी का RC कार्ड और हम दोनों के परिचय पत्र मांगे,कुल शुल्क 125 रुपये लगा।
यहाँ से आगे बढे तो टेंट सिटी थी,सुबह 7 बजे हम लोग मालिया से निकले थे,और अब दोपहर के 1 बज चुके थे,कुछ खाया नहीं था,टेंट सिटी में लगे स्टाल में जा पहुँचे, और कच्छ की प्रसिद्ध दाबेली पर टूट पड़े,क्या गजब का स्वाद था,स्टॉल संचालन वही के जयेश भाई कर रहे थे,उनसे भी अच्छा परिचय हो गया,बातों से और दाबेली से पेट और मन दोनों तृप्त होगये।
टेंट सिटी से सफ़ेद रण की दुरी करीब 5 किलोमीटर थी,उधर ही मोटरसाइकिल दौड़ा दी।
यहाँ से पाकिस्तान सीमा दूर नहीं है, इसकारण बी. एस. एफ का पेहरा व जाँच सघन है।
बी.एस.एफ के जवानो से राम राम की और आगे बढ़ गए,अब हमे कच्छ का सफ़ेद रण अपनी झलक दिखा रहा था।
पार्किंग में पहुँच कर गाड़ी पार्क की,हमारी गाड़ी के पास ही एक और गाड़ी थी,दिल्ली की,उस पर बेग भी बंधा हुवा था,लगता हे कोई अकेला ही आया है, मतलब हम अकेले सरफिरे नहीं थे।
इंदौर से 1100 किलोमीटर दूर मोटरसाइकिल चलाकर जिस सफ़ेद रेगिस्तान के लिए हम आये थे वह सामने था,पार्किंग से करीब 1 किलोमीटर की दुरी पैदल तय की,धीरे 2 हम आगे बढ़ते गए शुरुवात में रण का मैदान कुछ गिला था,जैसे 2 आगे बढ़ते गए,जमीनी परिदृश्य ठोस और सफ़ेद होता गया,अब रोड भी ख़त्म हुई और हमने अपना पहला कदम रख दिया,कच्छ के सफ़ेद रण में,दोनों के चहरे ख़ुशी से खिलखिला रहे थे,हम दोनों ने यात्रा का एक पड़ाव पूरा होने की बधाई दी,और खो गए कच्छ की प्राकृतिक सुंदरता में,पूर्णतः प्राकृतिक,मानव की निर्माण शक्ति का कोई हस्तक्षेप नहीं,जहाँ तक नजऱ जा रही थी,वहाँ तक पूरा परिदृश्य सफ़ेद और अनंत दुरी पर यह परिदृश्य नीले आसमान से मिल रहा था,अद्भुत नजारा था,जिसकी सुंदरता को शब्दों में नहीं पिरोया जा सकता।
देखा जाय तो,सफ़ेद रण में दो दुनिया बसी हुई थी,एक दुनिया थी मानव निर्मित टेंट सिटी,यहाँ खाने के पकवानों से लेकर हस्तशिल्प व हस्तनिर्मित कारीगरी वाले वस्रों की दुकानें, और ठहरने के लिए स्विस टेंट से लेकर ए.सी टेंट,जितना पैसा खर्च करो,उतनी ज्यादा सुविधा प्रदान कI जा रही थी इस दुनिया में,लेकिन ऐसा प्रतीत हो रहा था,मानव ने इतनी सुन्दर प्राकृतिक जगह का अतिक्रमण कर लिया है।
एक दुनिया और थी,वो थी कच्छ का सफ़ेद रण,जो की प्राकृतिक प्रेमियो के लिये एक अद्वितीय जगह थी।
हम तो खो से गए थे,इस जगह की सुन्दरता में।
फिर दौर शुरू हुवा फोटोग्राफी का जो निरंतर चलता रहा,कब 4 बज गए पता नहीं चला,बड़ी तमन्ना थी,कि रात यही बिताई जाय,लेकिन टेंट सिटी के रेट सुनकर दोनों ने ठान लिया की यहाँ नहीं रुकना।
कालाडूंगर की दुरी यहाँ से 50 किलोमीटर थी,वहाँ का सूर्यास्त काफी प्रसिद्ध है,पार्किंग में गए और गाड़ी लेकर फिर चल पड़े...कालाडूंगर..
शाम को 6 बजे पहुँच गये कालाडूंगर,यहाँ का दत्तात्रेय मंदिर और सनसेट काफी प्रसिद्ध है।
यही पर मुलाकात हुई एक और मोटरसाइकिल सवार से,जिसकी मोटरसाइकिल हमने कच्छ के रण में देखी थी।
शाम गहरा रही थी.. सूर्यास्त का समय था.. सबसे पहला काम रूम की व्यवस्था करना था, क्योंकि वहाँ केवल एक ही धर्मशाला थी..
तो मैं और मेरा मित्र गिरधर रूम के लिए धर्मशाला कक्ष में गए और सारी जानकारी लेने लगे... तभी वहाँ एक व्यक्ति और पहुँचा... और कहने लगा...
व्यक्ति-मुझे एक रूम चाहिए..
धर्मशाला मैनेजर- हाँ मिल जाएगा.. आपका नाम ? कहां से आये हैं...
मोटरसाइकिल वाला व्यक्ति- दिल्ली से आया हूं.. नाम नीरज जाट है ।
मैनेजर-ठीक है.. 750 का है रूम... चलेगा क्या?
नीरज- वैसे मैं अकेला ही हूं कुछ कम वाला है क्या...?
मैनेजर- हां फिर 350 वाला है?
नीरज- ठीक है। मैं रूम देख लेता हूं..
और वह व्यक्ति मतलब नीरज बाहर जाने लगा.. तभी मैं और मेरा मित्र भी बाहर आये और उस व्यक्ति मतलब नीरज से औपचारिक परिचय करते हुए... 350 वाले रूम को मिलकर लेने का प्रस्ताव रखा... और नीरज ने बेझिझक तुरंत हाँ कह दी..
यही वह पल था जब एक विशिष्ट घुमक्कड़ से परिचय प्रारंभ शुरू हुआ...
सबसे पहले हमने दोनों गाड़ियां पार्क की... नीरज की मोटरसायकल पर मेरी नजर पड़ते ही... मैंने उन्हें बताया... तुम्हारी गाडी तो हमने सफ़ेद रण पर भी देखी थी...
आगे बढ़ते हुए सूर्यास्त देखने जाने लगे..
जहां हम सूर्यास्त देखने के लिए भागदौड़ लगा रहे थे.. वहीं नीरज आराम शांत भाव से आगे बढ़ रहा था...
सूर्यास्त जल्द भी हो गया... और वहां तेज हवा चलने लगी.. पहले पहले तो मजा आ रहा था.. पर जल्दी ही हम दोनों मालवियों को ठण्ड लगने लगी.. पर नीरज आराम से आनंद ले रहा था...
नीरज का शांत भाव देख कर गिरधर कहने लगा.. इतना शांत और सीधा जाट पहली बार देखा है..
....
फिर मैंने उनसे पूछा पहली बाइक ट्रिप है..?
वो कहने लगे हाँ..
फिर मैंने बातों बातों में कहा- मुझे तो मोटरसायकल से लद्दाख जाना है... कभी आप गए हो क्या वहाँ..
नीरज- हाँ दो बार गया हूँ... पर मोटरसायकल से नहीं
मैने कहा- तो फिर बस से गए होंगे तब तो..
नीरज- नहीं एक बार ट्रेकिंग करने और एक बार सायकल से...
मैं आश्चर्य भाव से उसे देखने लग गया...
इसी पल से उस्की घुमक्कड़ी से भी साक्षात्कार शुरू हुआ.. जोकि अनवरत जारी है...
अब रात गहराना शुरू हो गई थी..
हम तीनों वापस कमरे की और जाने लगे..
मैंने फिर नीरज से पूछा- तुम्हे यह जगह पसंद आई या सफ़ेद रण?
नीरज ने कहा- नहीं ऐसा कुछ होता ही नहीं है... कोई भी स्थान या तो अच्छा होता है.. या बहुत ही अच्छा होता है.. बुरा तो कुछ नहीं होता है..
नीरज का जवाब बहुत ही प्रभावी था...
मेरे मन में धारणा बन रही थी कि यह व्यक्ति असाधारण है...
लेकिन उसका व्यवहार बहुत ही साधारण और सरल है..
उसकी ओर मेरा आकर्षण और बढ़ गया..
कमरे तक पहुँचे.. कुछ देर बाद खाना खाया.. और टहलने लगे..
अगले दिन के कार्यक्रम की चर्चा होने पर,आगे के कार्यक्रम के लिए नीरज ने प्रस्ताव दिया कि कल से हम लोग साथ में घूमेंगे.. आप भी अकेले हैं.. सभी के लिए ठीक रहेगा...
प्रस्ताव हम दोनों मित्रों को सहर्ष स्वीकार था..
अगली सुबह नीरज के साथ में घुमक्कड़ी शुरू हुई...
हमें कुछ नहीं करना था.. केवल उनके पीछे चलना था.. उन्हें हर रास्ते की.. हर जगह की जानकारी थी.. तो हम दोनों ही निश्चिन्त थे..
मन में सोच लिया था... घुमाओ भाई जहां घूमना चाहो.. कहीं भी घूम लेंगे..
यहाँ से अगले दो दिनों तक साथ ही घूमे...
नीरज को हर छोटे बड़े सड़क मार्ग और आसपास के भूगोल की अच्छी जानकारी थी...
मांडवी से हम तीनों दोस्तों ने वापसी का सफ़र शुरू किया...
भचाऊ पहुँचने पर इस विशिष्ट घुमक्कड़ से फिर मिलेंगे... कह कर अलविदा हो गए...
हम इंदौर के लिए.. और नीरज धौलावीरा के लिए रवाना हो गया...
समाप्त।



हो गई शुरुआत रेगिस्तान की...

भुगना-मिट्टी के घर...

फ़ीस काउण्टर

पहुँच गये कच्छ...

मेरा साथी,में,और हमारी सारथी...