उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा भाग 2 दिल्ली से देहरादून
उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा भाग-3 चकराता घाटी
उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा भाग-4-रहस्यमय बुधेर गुफ़ा और मोइला बुग्याल
उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा भाग-3 चकराता घाटी
उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा भाग-4-रहस्यमय बुधेर गुफ़ा और मोइला बुग्याल
उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा भाग - 5 टाइगर फॉल चकराता
उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा भाग-6 नज़ारे चकतारा घाटी और लाखामंडल के
भाग 7 धरासू-उत्तरकाशी होते हुवे गंगनानी के प्राकृतिक गर्मपानी कुंड(ऋषिकुंड)
उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा भाग-8 दर्शन गंगोत्री धाम के
उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा भाग - 9 सातताल ट्रैक व मुखबा भ्रमण
उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा भाग- 10 धराली से इंदौर वापसी
उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा भाग-6 नज़ारे चकतारा घाटी और लाखामंडल के
भाग 7 धरासू-उत्तरकाशी होते हुवे गंगनानी के प्राकृतिक गर्मपानी कुंड(ऋषिकुंड)
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उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा भाग - 9 सातताल ट्रैक व मुखबा भ्रमण
उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा भाग- 10 धराली से इंदौर वापसी
दिसम्बर 2016 में थार मोटरसाइकिल यात्रा पर गया
था,उसके साथ ही ओरछा महामिलन में भी आहुति
डाली थी।बस उसी के बाद ही सभी प्रकार की घुमक्कड़ी पर विराम लग गया था।उसके बाद मार्च 2017 में पिता बनने का परम सौभाग्य मिला,और इस जिम्मेदारी को मैने बहुत अच्छे से जिया ...
अपनी संतान को बड़ा करना दुनिया के सबसे कठिन कामों में से एक है,और यह काम ना तो माँ अकेले करती है..ना पिता..दोनों को मिलकर परिवार को साथ लेकर करना होता है,और हम सभी इस काम को मिलकर कर रहे थे।
खैर...हमारा बेटा कियान अब एक वर्ष से अधिक का हो चुका है,और अब में कुछ समय के लिए ही सही,लेकिन घुमक्कड़ी के मैदान में उतर सकता था..
और में उत्तराखंड के पहाड़ो में मोटरसाइकिल से जाने के मौके की तलाश में था...
एक दिन घुमक्कड़ मित्र नीरज कुमार की किसी फेसबुक पोस्ट पर कुछ टिप्पणी की तो उन्होंने पूछ लिया घुमने कब निकल रहे हो..साथ ही 23 जून से 27 जून हरसिल-नेलांग वैली (उत्तराखंड) यात्रा पर चलने के आमंत्रित किया,लेकिन यही तारीख़ पापा के आँवलखेड़ा (आगरा) जाने की भी थी..तो इन तारीख़ पर मेरा जाना सम्भव नही था।
फिर नीरज ने बहुत धीरे से कहाँ-"वैसे हम 5 जून को भी दिल्ली से हरसिल-गंगोत्री तरफ जा रहे है और 2 दिन की ट्रैकिंग भी होगी"। मैंने उससे भी धीरे से फुसफुसाया "में भी चलु क्या ?"और नीरज का जवाब था "हाँ चलो।"
नीरज के हाँ कहते ही मेरी उत्तराखंड-हरसिल-गंगोत्री-मो टरसाइकिल यात्रा पर मोहर लग गई।
इंदौर से दिल्ली और वापसी मे दिल्ली से इंदौर का सफर में अकेले करूँगा और दिल्ली-गंगोत्री-दिल्ली के सफर नीरज और उनकी श्रीमती जी साथ होंगे।
नीरज कुमार के साथ यात्रा करने का पता नही कौन सा रासायनिक संयोग बन जाता है।उनके साथ यह छठी यात्रा थी।और हर यात्रा में हमारा तालमेल और बेहतर रहता है..
इस यात्रा में श्रीमती दीप्ति सिंह(नीरज की पत्नी) भी साथ रहेंगी,इससे पहले पचमढ़ी मोटरसाइकिल यात्रा और थार मोटरसाइकिल में वे साथ रह चुकी है,तो इसबार मेरी तरफ से थोड़ा और सहज रहने का प्रयास रहेगा..इससे पहले मेरे दिमाग मे यही आता था,कि में इन दोनों के बीच कबाब में हड्डी बन कर क्या करूँगा।
इस यात्रा में ट्रैकिंग भी शामिल थी,तो डेकाथेलॉन से केचुआ के ट्रेकिंग शूज़ ले आया,टेंट तो पहले से था ही,बाकि जो लगेगा वह शास्त्री पार्क दिल्ली से मिल जायेगा,बाकि और कुछ खास तैयारी करना नही थी।
हाँ..एक ख़ास तैयारी और करना थी,मोटरसाइकिल को भी सर्विस करवाना था,तो अपनी बुलेट को में सर्विस सेंटर ले जाने के बजाय पास के ही मैकेनिक के पास ले जाता हूं..
सर्विस सेंटर वालो के पास ले जाना यानि कम से कम एक दिन वही बैठे रहो या गाड़ी छोड़कर आ जाव। तो पास के मैकेनिक से यात्रा के दो दिन पहले जनरल सर्विस,ऑइल चेंज,पिछला टॉयर चेंज,व्हील अलाइनमेंट जैसे जरूरी काम करवा लिए।
वक़्त का पता ही नहीं चला और 4 जून आ गई,दिल्ली से 5 जून की शाम को निकलने की बात हुई थी,उसी के अनुसार मेरी योजना इंदौर से 4 जून को निकालने की थी।
जून के महीने में अपने देश के किसी भी मैदानी इलाकों में आपस मे एक दूजे से अधिक गर्म रहने की होड़ सी मची रहती है।इंदौर और दिल्ली भी इस दौड़ में बने रहते है।और मुझे तो जयपुर और राजस्थान के बड़े हिस्से से भी गुजरना था।तो ठान लिया था...कि दिन के समय कम से कम गाड़ी चलाऊंगा,अधिकतम रात में ही चलूंगा।
इससे पहले भी लंबी मोटरसाइकिल यात्रा कर चुका हूं,तो मुझे पता था 900 किलोमीटर से अधिक इंदौर से दिल्ली की यात्रा कम से कम 18 घंटे जरूर लगेंगे।
04 जून 2018
में 03 जून रविवार को देवास(ससुराल) चले गया था।दीप्ति (मेरी पत्नी) और बेटा कियान वही थे।
यात्रा से पहले सब के साथ अच्छा समय बिताया, लेकिन गड़बड़ यह हो गई कि सभी ने मुझे वही रोक लिया।मेरी योजना रात में पैकिंग करने की थी,लेकिन कोई बात नही यह काम मैंने सुबह जल्दी आकर कर लिया।
पैकिंग कर के निपटा ही था कि नीरज का मैसेज आ गया..."आज ही चल देना,देवास मत रुकना और रात तक कम से कम ग्वालियर आ जाना।"
मेरे जवाब थे...
"भाई शाम को 4 के पहले निकलूंगा,देवास तो कल ही हो आया और जयपुर होते हुवे आऊंगा।"
वैसे इंदौर से दिल्ली पहुँचने के 3 प्रमुख रास्ते है।
1.इंदौर-आगरा-दिल्ली(शास्त्रीपा र्क)-850 किलोमीटर।
इस रास्ते मे इंदौर से आगरा तक अच्छी सड़क की कोई ग्यारंटी नही थी और रात में चलना सुरक्षित भी नही है।
2.इंदौर-कोटा-जयपुर-दिल्ली-835 किलोमीटर।
इस रास्ते से इंदौर-जयपुर का सफर (बस द्वारा)कर चुका हूं,तब झालावाड़-कोटा रोड़ की हालत बहुत खराब थी।सुना है अब रोड़ बन रहा है,लेकिन पूरा नही बना है।
3.इंदौर-नीमच-चित्तौड़-जयपुर-दि ल्ली-
900 किलोमीटर।
यह रास्ता सबसे लंबा जरूर है,लेकिन पूरा रास्ता 4 लेन और 6 लेन बना हुआ है,रात में भी गाड़ी चला सकते है,में इसी रास्ते से दिल्ली तक का सफर करूँगा।
04 जून को क्लीनिक में दिन का काम कर के दोपहर 2 बजे तक घर पहुँच गया,बिना इच्छा के थोड़ा सा खाना खाया और गाड़ी पर समान बांधा तब तक दोपहर के 3 बज गए,3.30 बजे मम्मी पापा से अलविदा कह कर में इंदौर से दिल्ली के लिए प्रस्थान कर चुका था।
घर से निकलते ही पेट्रोल टंकी पूरी भरवाई और सुपर कॉरिडोर होते हुए उज्जैन रोड़ पर गाड़ी दौड़ाने लगा।अभी शाम नही हुई थी और गर्मी बहुत थी,लेकिन सर से लेकर पेर तक का हिस्सा ढ़का हुवा था।इसलिए बहुत ज्यादा परेशानी नही होनी थी।
इंदौर से उज्जैन बढ़िया 4 लेन रोड बना है।उज्जैन के बाद मुझे उन्हेल-नागदा-जावरा रोड़ पर जाना था,तो उज्जैन से बायपास रोड़ पर आ गया,जब जावरा रोड़ पर पहुँचा,इंदौर से 70 किलोमीटर की दूरी तय कर चुका था,यही पेट्रोल पम्प पर पानी पी कर,5 मिनिट का आराम लिया और फिर से चल पड़ा...
अब उज्जैन से जावरा का सफर 2 लेन रोड़ पर करना था,रात में इस रोड़ पर अच्छी खासी परेशानी होती है,लेकिन दिन में आराम से चल सकते है,बस 2 लेन रोड़ के अनुसार ही अपनी गति बनाये रखें,में इस रोड पर 70 किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड आगे बढ़ते जा रहा था।
शाम 6.30 बजे के करीब जावरा पहुँच गया।अब मुझे नयागाँव-इंदौर 4 लेन रोड़ पर नयागाँव (नीमच-निम्बाहेड़ा) की और आगे बढ़ना था।घर से निकले 3 घंटे से ज्यादा समय हो गया था और अब तक गाड़ी से उतारा भी नही था,तो गाड़ी से उतर कर रोड़ किनारे ही खड़ा हो गया,कुछ सेल्फी भी ली,इस बहाने 10 मिनिट का आराम भी हो गया।
थोड़ा सा आराम कर सफर फिर से शुरू किया,रोड़ बढ़िया 4 लेन था,तो 70-80 के बीच वाली गति से आगे बढ़ता रहा।
जावरा-मंदसौर-नीमच बेल्ट में अफ़ीम की खेती बड़े स्तर पर होती है,नतीज़न अफ़ीम की बढ़िया पैदावार भी होती है,और उसके साथ साथ अवैध सप्लाय का कारोबार भी खूब होता है।इसी कारण से मध्यप्रदेश-राजस्थान सीमा पर कभी कभी नाका बंदी कर के पूछताछ होती रहती है।
इन सबसे बचने के लिए में जल्दी से जल्दी निम्बाहेड़ा पार होना चाहता था।जावरा से निम्बाहेड़ा की दूरी 138 किलोमीटर है।ट्रैफिक भी बहुत ज्यादा नही था।
9 बजे से पहले निम्बाहेड़ा पार कर लिया।इसकी खुशी मनाई भी नही कि पुलिस वालों की गेंग नाका बंदी कर खड़ी दिख गई और मुझे भी रोक लिया।
पुलिस वालों से निपटने का आसान उपाय है कि जो पूछे उसका सीधा जवाब पूरे आत्मविश्वास के साथ दे दो...आगे प्रभु इच्छा...!
पुलिस वाले ने सबसे पहले पूछा किधर से आये हो ?
मैंने कहाँ-इंदौर से।
कहाँ जावगे इन्नी गर्मी में..?
मैंने कहाँ जयपुर।
तो पूरी रात गाड़ी चलावगे..?
नही जी..! भीलवाड़ा पहुँच के रुक जाऊँगा।
(बस यही एक झूठ बोलना पड़ा)
क्या करते हो..?
डॉक्टर हु...
अच्छा ठीक है । जाव जाव। आराम से जा जो..
नाकाबंदी से निपटकर आगे चित्तोड़गढ़ की और बढ़ने लगा।निम्बाहेड़ा से चित्तोड़ की दूरी 38 किलोमीटर के करीब ही है।जब चित्तौड़ शहर मे प्रवेश किया तो रात के 10 बजे थे,लेकिन हर और सन्नाटा था,दुकाने बंद हो चुकि थी।लगातार गाड़ी चलाते हुवे 6 घंटे से अधिक हो गए थे,कुछ थकान और थोड़ी भूख भी लग रही थी।शहर से बाहर निकलते ही ढाबों की श्रृंखला दिखाई दी,बस यही गाड़ी टेक दी।
अब एक दो घंटे के आराम की जरूरत थी,रुककर सबसे पहले कुछ जरूरी फ़ोन (घर पर) कर लिए।और खटिया पर पड़ गया,थोड़ी देर बाद ठीक लगने लगा तो चाय के लिए कहा लेकिन ढ़ाबे वाले ने इन्कार कर दिया.. फिर खाने का पूछा तो पता चला केवल दाल-बाटी-छाछ मिल पायेगा।
लेकिन मुझे तो थोड़ा आराम कर के आगे बढ़ना था,दाल-बाटी खा ली तो नींद आयेगी।मेरे पास इसका ईलाज था, ढ़ाबे वाले से कह दिया भाई सा एक काम करो केवल दाल दे दो,बाटी रहने दो।
मम्मी ने जिद्द करके पराठे पैक कर दिए थे,वही पराठे निकाल कर दाल के साथ खा लिए।
यहाँ अभी भी बहुत गर्मी थी,लेटे लेटे भी पसीना आ रहा था,गला सुख रहा था,खाने के बाद 2 गिलास छाछ के पी गया,आर ओ वाटर के कैम्पर दिखाई दिए तो यही से अपनी पानी की बोतल भी भरवा ली।
खाना खाने के बाद भी बहुत देर लेटा रहा।
मेरी यात्रा की जानकारी मेरे घुमक्कड़ दोस्तो को भी थी,यही प्रतीक गाँधी (मुम्बई) का भी फ़ोन आ गया...
मेरी यात्रा की जानकारी मेरे घुमक्कड़ दोस्तो को भी थी,यही प्रतीक गाँधी (मुम्बई) का भी फ़ोन आ गया...
फिर व्हाट्सएप ग्रूप "घुमक्कड़ी दिल से.." में चेटिंग होने लगी,तो सलाह मिली रात को आराम करलो कल सुबह आगे जाना..लेकिन यहाँ रुककर आराम करने मे कई दिक्कतें थी।
साधारण कमरे में गर्मी से बुरा हाल होता,तीन-चार घंटे के लिए ए.सी कमरा लेना महँगा सौदा होता और फिर कल दिन की गर्मी और दिल्ली का ट्रेफ़िक भी दिमाग मे था।
ढ़ाबे पर खाने के बाद आराम कर के फिर से तरोताजा था। तो फिर से आगे चल पड़ा।अब की बार सोच लिया था कि हर घंटे में चाय कोल्डड्रिंक पीते पीते आगे बढूंगा।इंदौर से चित्तौड़(340 किलोमीटर) साठे छह घंटे में आ गया था,मतलब प्रतिघंटा 50 किलोमीटर से भी अधिक चल रहा था,जल्दबाजी करने की कोई जरूरत नही थी।
चित्तोड़ शहर से निकल कर उदयपुर-किशनगढ़ रोड़ पर आ गया,चित्तोड़ से किशनगढ़(200 किलोमीटर) तक इसी रोड़ पर चलना है।वैसे यह 4 लेन रोड़ है,लेकिन 6 लेन रोड़ में बदलने का काम चल रहा है।
चित्तोड़ से निकलते ही पेट्रोल टंकी पूरी भरवा ली और दो बार चाय-कोल्ड्रिंक का ब्रेक लेते हुवे किशनगढ पहुँच गया।
किशनगढ से दिल्ली तक का सफर स्वर्णिम चतुर्भुज प्रसिद्ध NH-8 पर होगा,यह शानदार 6 लेन रोड़ है।
NH-8 शुरु होते ही ढाबों की श्रृंखला दिखाई दी,एक गुमनाम से ढ़ाबे पर कम से कम तीस मिनीट का आराम का मूड बना कर खटिया पर लेट गया,ढ़ाबे वाला भाई तेज़ आवाज में टी.वी पर कोई मूवी देख रहा था,फिर भी कब झपकी लग गई पता नही लगा।
उठते ही चाय की फरमाइश कर दी,ढ़ाबे वाले से बात करने पर पता लगा कि इस रूट पर दिन में ट्रेफ़िक बहुत कम हो जाता है, गर्मी के कारण,ट्रक वाले भी रात में ही चलना पसन्द करते है,इसलिए वो भी रातभर ढाबा चालू रखता है और दोपहर में आराम करता है।वैसे दिन में रेतीले तूफ़ान भी चलते रहते है,कुल मिलाकर अब मुझे रात में चलने के फ़ायदे नज़र आ रहे थे।
उधर दिल्ली से नीरज कुमार सोते जागते मुझे ट्रेक कर रहा था,उसे अपनी स्थिति बताई,भाई किशनगढ़ पार हो गया हूं..उसे मेरी आदत पता है,फिर भी औपचारिकतावश कही रूम लेकर आराम करने को कह दिया।मैंने कह दिया"भाई गर्मी बहुत है,कमरा नही लूंगा ढाबों पर आराम करते करते आगे बढ़ रहा हु।
यहाँ रुके मुझे 30 मिनिट से ज्यादा हो गए थे।फिर से रिफ्रेश था।घड़ी देखी तो रात के 3 बजे थे।
बड़ी मोटरसाइकिल यात्राओं में छोटे छोटे लक्ष्य बनाकर आगे बढ़ना,मुझे बहुत अच्छा लगता है,अगला लक्ष्य जयपुर था।
बड़ी मोटरसाइकिल यात्राओं में छोटे छोटे लक्ष्य बनाकर आगे बढ़ना,मुझे बहुत अच्छा लगता है,अगला लक्ष्य जयपुर था।
अच्छा हाँ अपने एक घुमक्कड़ मित्र देवेन्द्र कोठारी जी का निवास भी जयपुर मे ही है।उनका संदेश भी आया था कि भाई मिलते हुवे जाना,घर ही आ जाव तो और अच्छा।लेकिन जयपुर पहुँचने का मेरा समय ऊटपटांग था,सुबह 4-5 बजे उन्हें उठाना मुझे ठीक नही लगता,और फिर जितना रुकूँगा,उतना अधिक धूप में गाडी चलाना पड़ेगी,इसलिए आते समय जरूर मिलने का वादा कर लिया, अब ये वादा कब पूरा होगा,ये न उन्हें पता है,न मुझे,लेकिन पूरा जरूर होगा..!! ये हम दोनों जानते है।
में NH-8 पर ही आगे बढ़ते जा रहा था,सुबह जब थोड़ा थोड़ा उजाला होने लगा तब में जयपुर शहर पार कर दिल्ली की ओर अग्रसर हो रहा था।
इंदौर से प्रस्थान किये 12 घंटे से ज़्यादा हो गये थे,अब थोड़ी थकान महसूस हो रही थी,बीच मे ही कही रुककर इधर उधर के फ़ोटो ले लिए,शहर ख़त्म होते ही ढाबों की श्रंखला दिखाई दी...
इंदौर से प्रस्थान किये 12 घंटे से ज़्यादा हो गये थे,अब थोड़ी थकान महसूस हो रही थी,बीच मे ही कही रुककर इधर उधर के फ़ोटो ले लिए,शहर ख़त्म होते ही ढाबों की श्रंखला दिखाई दी...
ढ़ाबे पर गाड़ी टिकाना, फिर खटिया पकड़ना फिर चाय की फरमाइश करना,और तरोताज़ा होकर फिर चल पड़ने की मानों शरीर को आदत सी हो गई थी।इसबार भी बिल्कुल यही किया और फिर दिल्ली की ओर आगे बढ़ता रहा।
जैसे मेने बताया था,में NH-8 पर गाड़ी चला रहा हु,यह एक शानदार 6 लेन हाइवे है,जयपुर से निकल कर कोटपूतली कब पार हो गया पता ही नही लगा।
जब नीमराना से गुजर रहा था,तब घड़ी देखी तो सुबह के 8 बज रहे थे,और धूप अपने पूरे रंग में थी।ऐसा लग रहा था जैसे दिन के और मेरे,दोनो के 12 बज गए हो...ऐसे में गाड़ी अपने आप ही रोड़ किनारे एक बढ़िया से ढ़ाबे पर रुक गई।
यहाँ गाड़ी को खड़ी कर बहुत प्यार से निहारा तो ऐसा लगा जैसे वो कह रही हो बस करो मालिक। मैंने भी कह दिया तु आधा घंटा आराम करले..फिर चलेंगे दिल्ली...जोकि अब दूर नही है।
ढ़ाबे पर जाते ही वॉशरूम का रास्ता पकड़ा और पूरे शरीर पर पानी मार लिया.. फिर वही खटिया..लेकिन इस बार चाय की जगह बूंदी रायते की बारी थी।बूंदी रायता खत्म होते होते 8.30 बज चुके थे।
अब यहाँ से बस दिल्ली शास्त्री पार्क नजर आ रहा था।लेकिन अब यहाँ से शास्त्री पार्क की मंजिल आसान नही थी।नीमराना से गुड़गांव तो आसानी से पहुँच गया।लेकिन यही से बढ़िया ट्रैफिक शुरू हो गया,फिर भी किसी तरह ट्रैफिक के साथ बहते जा रहा था।
सुबह 10 बजे में गुड़गाँव में था।
गूगल मैप पर नीरज के घर का रास्ता इंदौर से देखा था तो यह समझ गया था कि गुड़गांव वाले रोड़ पर आख़री तक बने रहना है।
तो में इसी रोड़ पर चले जा रहा था।लेकिन दिल्ली में प्रवेश करते ही दसों दिशाओं में रास्ते और फ्लाईओवर देख दिमाग से पूरा मैप वाश हो गया। सोचा गूगल नेविगेशन चालू कर लेता हूँ लेकिन जब मोबाइल निकाला तो बैटरी 20% से कम बची थी,और चार्जिंग का कोई जुगाड़ भी नही था।इसलिए नीरज को फोन कर के रास्ते की जानकारी लेना बेहतर समझा।
उसने बता दिया शास्त्री पार्क मैट्रो स्टेशन आ जाव,धौलाकुआं और करोलबाग होते हुवे..
गुड़गांव रोड़ से करोलबाग तक के दिशानिर्देश रोड़ पर मिल रहे थे,ट्रेफ़िक और भीषण धूप-गर्मी-उमस का सामना करते करते करोल बाग तो पहुँच गया।लेकिन अब यहाँ से शास्त्री पार्क कैसे जाया जाए यह समझ नही आ रहा था।ऑटो वाले से पूछा तो पता चला पहले तीस हजारी कोर्ट और उसके बाद शाहदरा होते हुवे जाना होगा,इसके लिए पहले तो करोलबाग की गलियों से बाहर निकला,फिर तीस हजारी और शाहदरा होते हुवे शास्त्री पार्क स्टेशन पहुँच गया,यहाँ से नीरज को फ़ोन किया तो पता लगा जनाब दिन की ड्यूटी कर रहे है,तो फ़ोन पर ही रास्ता समझा और पास में ही मैट्रो क्वाटर के E ब्लॉक की ओर चल दिया,ज्यादा खोजबीन करता उससे पहले ही नीरज की वाइफ दीप्ति ने मुझे आवाज लगा दी।किस्मत से वो उस समय नीचे ही थी।
फटाफट गाड़ी से सामान खोला और लंबी गहरी सांस ली,पूरा शरीर पसीने से लथपथ था,समय देखा तो दोपहर के 12 बज रहे थे,मतलब घर से निकले 20 घंटे हो चुके थे,गाड़ी के मीटर में देखा तो 944 किलोमीटर आ चुका था,इसमे सबसे ज्यादा थकान गुड़गांव से शास्त्री पार्क के 50 किलोमीटर में हुई,इसे तय करने में दो से ढाई घंटे का समय लग गया।
ऊपर फ्लेट में घुसते ही 1 बड़े पंजाबी गिलास में भरे रुह-अफजा से स्वागत हुआ,शरीर को इसकी जरूरत भी थी।अब आराम से नहाकर अपना हुलिया सुधारा और कूलर के सामने लगे पलंग पर पड़ गया,दीप्ति ने खाने के लिए पूछा तो मैंने निंद पूरी कर के खाने का कह दिया...
और सो गया..
उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा भाग 2 दिल्ली से देहरादून
उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा भाग-3 चकराता घाटी
उत्तराखंड मोटरसाइकिल यात्रा भाग-4-रहस्यमय बुधेर गुफ़ा और मोइला बुग्याल
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लगे रहो भाई । खूब जोट्टा मारा । वैसे दोनों की पत्नियों का नाम दीप्ती ! सही है । अगली पोस्ट के इंतजार में ।
ReplyDeleteधन्यवाद भाई...
Deleteहाँ.. मेरी दीप्ति का केवल एक ही नाम है..
उनकी दीप्ति के कई नाम है...लेकिन आजकल यही नाम चल रहा है...
गजब ...अगले भाग का बेसब्री से इंतजार ।
ReplyDeleteधन्यवाद कविवर..
Deleteबहुत जल्द आ जायेगा अगला भाग..👍
ReplyDeleteBahut badhiya sumit bhai, raat ka safar majedaar rehta hai agar kahin raasta naa bhatko to..waise subah subah jhapki bhi khoob aati hai...maja aa raha hai padhne mein
बिल्कुल सही कहा प्रदीप जी रात का सफ़र मज़ेदार रहता है...लेकिन सारी सावधानियों के साथ...
Deleteधन्यवाद आपका..👍
बहुत बढ़िया शुरुआत डॉक्टर साहब...
ReplyDeleteधन्यवाद अनिल जी...
Deleteशानदार यात्रा का आगाज ... हम भी साथ है चलते रहो मुसाफिर☺☺☺
ReplyDeleteधन्यवाद..👍
Deleteबहुत बढ़िया, पता नही रात का सफर कैसे कर लेते है सब। यहां तो 10 बजे के बाद ही चक्कर आने शुरू हो जाते है������
ReplyDeleteधन्यवाद..अमित जी...👍
Deleteअपने शौक के कारण सब हो जाता है...
श्रीमान जी नमस्कार बहुत सुंदर लेख
ReplyDeleteपर अब पढ़ने के बाद पता लग रहा ह आप नीमराना हो कर गए हम भी नीमराना के पास ही रहते ह अगर पहले पता चल जाता तो आपकी खिदमत में हाजिर रहते पर चलो फिर कभी
नमस्कार अशोक जी...
Deleteधन्यवाद आपको...
फिर कभी ही सही...👍
बढिया शुरूआत ...पढ कर मजा आया
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद सचिन जी..
Deleteलेखक की मित्रता का असर, गजब लिख दिए हो। शुभकामनाएं ❤��❤
ReplyDeleteसही कहा आपने...
Deleteबहुत बहुत धन्यवाद...
शानदार ब्लॉग लेखन । चारों पोस्ट पढली ।
ReplyDeleteअगली पोस्ट का ईंतजार है । जल्दी लिखे ।
धन्यवाद शर्मा जी...
ReplyDeleteजरूर..लेखन अब जारी रहेगा...
शानदार विवरण डॉक्टरसाहब अगली पोस्ट का ििइंतजआर रहेगा
ReplyDeleteधन्यवाद... अगली पोस्ट आने ही वाली है।
ReplyDeleteशानदार वर्णन किया है भाई👍👍👍
ReplyDeleteधन्यवाद मिश्रा जी...
Deleteबहुत बढ़िया डॉक्टर साहब ।
ReplyDeleteधन्यवाद...
Deleteभाई मुझे भी सलाह देने की कम इच्छा होती है लेकिन उस दिन फोन मेने आपको रुकने का कहने के लिए किया था आपको फिर आपसे बात करके लगा कि आप तो चला लोगे रात भर....बढ़िया शुरुआत
ReplyDeleteधन्यवाद भाई...
Deleteदिन के तापमान के कारण ही रातभर चलना पड़ा..
वाह ! लेखन पड़कर लग रहा था हम भी आपके साथ यात्रा में शामिल है ।
ReplyDeleteबहुत बढ़िया लेख लिखा है भाई सा..
धन्यवाद...
Deleteचलिए तो फिर सफ़र गंगोत्री तक जारी रखेंगे..
बहुत ही लम्बी रही आपकी ये बाइक यात्रा... विवरण भी जबरदस्त रहा आपका
ReplyDeleteधन्यवाद रितेश जी..950 किलोमीटर 20 घंटे..👍
ReplyDelete